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रेत माफिया बेलगाम, प्रशासन बेखबर : लैलूँगा में धड़ल्ले से हो रही अवैध रेत डंपिंग, सरकार की चुप्पी सवालों के घेरे में

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रेत माफिया बेलगाम, प्रशासन बेखबर: लैलूंगा में धड़ल्ले से हो रही अवैध रेत डंपिंग, सरकार की चुप्पी सवालों के घेरे में

लैलूंगा/रायगढ़ (छत्तीसगढ़) – छत्तीसगढ़ के लैलूंगा क्षेत्र में रेत माफियाओं का आतंक लगातार बढ़ता जा रहा है। नदियों की छाती को चीरकर जिस बेरहमी से अवैध खनन और डंपिंग की जा रही है, उसने न सिर्फ पर्यावरणीय संकट को जन्म दिया है, बल्कि सरकारी राजस्व की भी भारी हानि हो रही है। ओडिशा से बड़े पैमाने पर रेत लाकर लैलूंगा के विभिन्न गांवों – नारायणपुर, लमडांड, और आसपास के इलाकों – में अवैध रूप से बेची जा रही है। हैरत की बात यह है कि इस सबके बावजूद प्रशासन और खनिज विभाग पूरी तरह से मूकदर्शक बने हुए हैं।

गैर स्वीकृत घाटों से अवैध खुदाई, मशीनों का धड़ल्ले से इस्तेमाल

स्थानीय ग्रामीणों और सूत्रों की मानें तो लैलूंगा और उसके आसपास के क्षेत्रों में कई ऐसे घाट सक्रिय हैं जिन्हें न तो सरकार की स्वीकृति प्राप्त है और न ही उनके संचालन की कोई वैध अनुमति है। इन घाटों पर भारी-भरकम पोकलेन मशीनों और हाई-लिफ्ट डम्पफरों की मदद से दिन-रात रेत निकाली जा रही है। यह सब कुछ इतनी खुलेआम हो रहा है कि मानो यह अवैध नहीं बल्कि सरकारी संरक्षण में संचालित कोई योजना हो।

रेत की डंपिंग के लिए गांवों में अस्थायी गोदाम बना लिए गए हैं जहां माफिया अपनी मनमानी कीमतों पर रेत बेच रहे हैं। सरकारी रेट की अनदेखी करते हुए रेत की किल्लत का डर दिखाकर लोगों से कई गुना अधिक दाम वसूले जा रहे हैं।

ओडिशा से हो रही तस्करी, सीमा पार से सीधा सप्लाई

खबर है कि ओडिशा से बड़ी मात्रा में रेत लाकर छत्तीसगढ़ में बेचा जा रहा है। डम्पर, हाईवा और ट्रैक्टर-ट्रॉली जैसे भारी वाहन बिना किसी चेकिंग के दिन-रात दौड़ रहे हैं। स्थानीय पुलिस, परिवहन विभाग और खनिज विभाग को यह सब दिखाई नहीं देता, या फिर जानबूझकर अनदेखा किया जा रहा है – यह एक बड़ा सवाल बनकर उभरा है।

प्रशासन की नाक के नीचे हो रही लूट, कोई सुनवाई नहीं

प्रशासन की भूमिका पर सवाल उठाना अब जनता की मजबूरी बन गई है। जब दिन-दहाड़े सड़क पर खुलेआम रेत से भरे ट्रक दौड़ते हैं, जब गांवों के बीच खुले मैदान रेत गोदाम बन जाते हैं, तो आखिर प्रशासन को यह क्यों नहीं दिखाई देता? क्या यह सब कुछ प्रशासन की जानकारी के बिना संभव है?

स्थानीय जनप्रतिनिधियों और सामाजिक कार्यकर्ताओं का आरोप है कि प्रशासन की चुप्पी माफियाओं से मिलीभगत का संकेत देती है। कई बार शिकायतें करने के बावजूद कार्रवाई के नाम पर सिर्फ खानापूर्ति की जाती है – एक-दो वाहनों को जब्त कर लेना, मामूली जुर्माना लगाना और फिर सब कुछ जस का तस छोड़ देना।

प्राकृतिक संसाधनों का दोहन, पर्यावरण पर गंभीर असर

रेत नदियों की जीवनरेखा होती है। यह न सिर्फ जलधारा को नियंत्रित रखती है, बल्कि इसके माध्यम से भूजल स्तर भी संतुलित रहता है। लेकिन जब इसी रेत का अवैध दोहन किया जाता है, तो नदियों का अस्तित्व खतरे में पड़ जाता है।

लैलूंगा क्षेत्र में हो रहे इस अंधाधुंध खनन से नदियों का प्राकृतिक प्रवाह बाधित हो रहा है। नदियों की गहराई असंतुलित हो गई है, जिससे बाढ़ का खतरा भी बढ़ गया है। इसके अलावा, आसपास के खेतों में सिंचाई पर भी प्रभाव पड़ रहा है क्योंकि भूजल स्तर लगातार नीचे जा रहा है।

सरकार कब जागेगी? जनता पूछ रही है सवाल

जनता अब सरकार से यह जानना चाहती है कि वह आखिर कब तक इस लूट को नजरअंदाज करती रहेगी? लाखों-करोड़ों का राजस्व घाटा, प्राकृतिक संसाधनों का विनाश और कानून का खुलेआम उल्लंघन – इन सबके बावजूद कोई ठोस कार्रवाई क्यों नहीं की जा रही?

क्या प्रशासन और खनिज विभाग की भूमिका की जांच नहीं होनी चाहिए? क्या जिन अधिकारियों की निगरानी में यह सब हो रहा है, उन्हें जिम्मेदार ठहराया नहीं जाना चाहिए?

जनता की मांग: सख्त कार्रवाई हो

लैलूंगा क्षेत्र की जनता अब सड़कों पर उतरने को मजबूर है। स्थानीय पंचायतों से लेकर सामाजिक संगठनों तक सभी की एक ही मांग है:

1. गैर स्वीकृत घाटों पर तत्काल रोक लगे।


2. रेत माफियाओं के खिलाफ एफआईआर दर्ज कर सख्त कानूनी कार्रवाई हो।


3. प्रशासनिक अधिकारियों की भूमिका की उच्चस्तरीय जांच हो।


4. खनिज विभाग और पर्यावरण विभाग की संयुक्त निगरानी टीम गठित की जाए।


5. जिला स्तर पर रेत खनन की समीक्षा और नियंत्रण के लिए जनसुनवाई का आयोजन हो।



राजनीतिक चुप्पी भी सवालों के घेरे में

यह मामला सिर्फ प्रशासनिक नहीं बल्कि राजनीतिक निष्क्रियता का भी है। विपक्ष हो या सत्ता पक्ष, किसी ने भी इस विषय पर खुलकर आवाज नहीं उठाई। क्या इसका मतलब यह निकाला जाए कि राजनीतिक संरक्षण के बिना यह अवैध कारोबार संभव नहीं है?

अगर किसी गरीब ग्रामीण द्वारा एक बोरी रेत बिना रसीद के बेच दी जाए तो उस पर जुर्माना, एफआईआर और यहां तक कि जेल हो जाती है। लेकिन जब सैकड़ों ट्रक रोज़ अवैध रेत ढोते हैं, तो वह ‘प्रक्रिया में है’ कहकर मामला ठंडे बस्ते में डाल दिया जाता है।

समाप्ति: कब जागेगा तंत्र?

लैलूंगा में रेत की अवैध डंपिंग सिर्फ एक स्थानीय मुद्दा नहीं है, यह पूरे छत्तीसगढ़ में बढ़ती प्रशासनिक उदासीनता और भ्रष्टाचार का आईना है। अगर समय रहते इस पर रोक नहीं लगी तो आने वाले समय में इसका खामियाजा सिर्फ पर्यावरण ही नहीं, बल्कि आम जनता को भी भुगतना पड़ेगा।

प्रशासन को अब आंखें खोलनी होंगी। सरकार को सख्त फैसले लेने होंगे। खनिज विभाग को हर स्तर पर जवाबदेह बनाना होगा। नहीं तो जनता का आक्रोश सड़कों पर फूटेगा और फिर उसे संभालना मुश्किल हो जाएगा।

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चंद्रशेखर जायसवाल
चंद्रशेखर जायसवाल
OWNER/EDITOR - CHANDRASHEKHAR JAISAWAL Mo.-9340765733
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