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लैलूँगा : सालों से बंद पड़ा सोनाजोरी उप स्वास्थ्य केंद्र, मेडम घर से चलाती हैं इलाज और किराना दुकान

सालों से बंद पड़ा सोनाजोरी उप स्वास्थ्य केंद्र, मेडम घर से चलाती हैं इलाज और किराना दुकान

लैलूंगा (रायगढ़): क्षेत्र के ग्रामीणों के लिए स्वास्थ्य सुविधाओं का एकमात्र सहारा माने जाने वाला सोनाजोरी उप स्वास्थ्य केंद्र बीते चार वर्षों से पूरी तरह बंद पड़ा है। इस स्वास्थ्य केंद्र में न तो बिजली की सुविधा है, न शौचालय, न पंखा और न ही कूलर जैसी मूलभूत सुविधाएं। इन सुविधाओं के अभाव के कारण स्वास्थ्य केंद्र में किसी भी प्रकार की चिकित्सकीय सेवाएं नहीं दी जा रही हैं।

इस संबंध में सोनाजोरी की एनएम (नर्सिंग मिडवाइफ) फ्लोरा एक्का ने बताया कि पिछले 4 सालों से यह उप स्वास्थ्य केंद्र पूरी तरह बंद है। उन्होंने बताया कि भवन की हालत बेहद जर्जर है और सुविधाओं के अभाव में वहां मरीजों का इलाज करना असंभव है। उन्होंने यह भी बताया कि उनके पास जब भी कोई मरीज आता है, तो वे उसे अपने घर में ही प्राथमिक उपचार देती हैं। यदि मरीज की हालत गंभीर होती है, तो उन्हें लैलूंगा के अस्पताल रिफर किया जाता है।

सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि जहां एक ओर उप स्वास्थ्य केंद्र बंद पड़ा है, वहीं मेडम फ्लोरा एक्का अपने ही घर से न सिर्फ इलाज का काम कर रही हैं, बल्कि वहीं एक किराना दुकान भी चला रही हैं। ग्रामीणों का कहना है कि एक तरफ स्वास्थ्य केंद्र जैसी सरकारी सुविधा बंद पड़ी है, वहीं मेडम का घर “क्लिनिक सह दुकान” बन गया है।

लगभग पांच ग्राम पंचायत के लोग इस उप स्वास्थ्य केंद्र पर निर्भर हैं, जिनमें सोनाजोरी, तोलमा, चव्रपुर  शामिल हैं। इन क्षेत्रों के ग्रामीणों को प्राथमिक उपचार के लिए अब 20 से 25 किलोमीटर दूर लैलूंगा जाना पड़ता है। इससे न केवल समय की बर्बादी होती है, बल्कि गंभीर मरीजों के लिए यह दूरी जानलेवा भी साबित हो सकती है।

ग्रामीणों ने बताया कि कई बार स्वास्थ्य विभाग और स्थानीय प्रशासन से इस मुद्दे को उठाया गया, लेकिन अब तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई। न ही भवन की मरम्मत हुई और न ही आवश्यक सुविधाओं की व्यवस्था की गई।

ग्रामीणों की मांग है कि प्रशासन तत्काल इस उप स्वास्थ्य केंद्र की मरम्मत कराए, वहां बिजली, पानी, शौचालय जैसी मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध कराए जाएं और चिकित्सा स्टाफ की नियमित उपस्थिति सुनिश्चित की जाए।

यह स्थिति न केवल स्वास्थ्य विभाग की विफलता को उजागर करती है, बल्कि ग्रामीण क्षेत्रों की बदहाल स्वास्थ्य व्यवस्था की एक कड़वी हकीकत भी सामने लाती है। सवाल यह उठता है कि जब सरकार ग्रामीण स्वास्थ्य सेवाओं को सुदृढ़ बनाने के लिए करोड़ों रुपये खर्च कर रही है, तो फिर ऐसी लापरवाहियों की जिम्मेदारी कौन लेगा?

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