“कटेलपारा का ‘पुल’ बना कीचड़ का दलदल: ठेकेदार की जुबान सीमेंट की, काम मिट्टी का!”
लैलूंगा/वार्ड क्रमांक 05 कटेलपारा हाईस्कूल पारा में नहर पर बन रहा पुलिया अब आमजन के लिए राह नहीं, बल्कि राहु बनता जा रहा है। सिंचाई विभाग की देखरेख में हो रहे इस निर्माण कार्य की दशा ऐसी है कि जनता अब ‘पुल’ शब्द सुनते ही कांप उठती है। ठेकेदार ने जैसे पुल नहीं, जनता के भरोसे पर ही ‘मिट्टी’ डाल दी हो।
बीते दो माह से क्षेत्र में नहर लाइनिंग का काम हो रहा है। यह काम सिंचाई विभाग के ठेकेदार द्वारा कराया जा रहा है। योजना थी कि नहर के ऊपर एक मजबूत सीमेंट-कंक्रीट का पुल बनेगा जिससे आम लोगों, बच्चों, महिलाओं, बुजुर्गों और पशुओं को आवागमन में कोई परेशानी न हो। परंतु अब जो दृश्य सामने है, वह किसी व्यंग्य चित्र से कम नहीं।
पुलिया नहीं, ‘पाइपिया’ बना डाली!
कहने को तो पुल बनाया गया है, पर असल में ये एक जुगाड़ू पाइप व्यवस्था है। पुल के नाम पर किनारे दो पिलर खड़े कर दिए गए और बीच में बड़े-बड़े सीमेंट पाइप रख दिए गए। ऊपर से मिट्टी डालकर इसे ‘पुल’ घोषित कर दिया गया। मानो ठेकेदार को भरोसा हो कि जनता की उम्मीदें मिट्टी जितनी ही कमजोर हैं — एक बारिश आई, और सब धंस गया।
बरसात ने खोल दी पोल
जैसे ही पहली बरसात हुई, पुल का असली रूप सामने आ गया। मिट्टी की परतें दलदल में बदल गईं। राहगीरों के जूते जहां कीचड़ में फंस गए, वहीं बुजुर्गों की लाठी भी वहां साथ छोड़ गई। पालतू जानवरों के पैर कीचड़ में धंसे तो बच्चों की स्कूल यात्रा भी थम गई। यानी पुल बना ही ऐसा, जैसे “मकान नहीं, मृगमरीचिका बना दी हो”।
ठेकेदार की बातों में सीमेंट, काम में केवल ‘झोल’
स्थानीय निवासियों ने बताया कि कार्य शुरू करते समय ठेकेदार ने कहा था कि पुल को सीमेंट-कंक्रीट से पूरी मजबूती दी जाएगी। किन्तु, ठेकेदार की बातें तो सीमेंट की थीं, पर काम में केवल ‘झोल’ ही मिला। अब जनता सवाल कर रही है – अगर ऐसा ही पुल बनना था तो उसके लिए इतने बड़े अधिकारी और इंजीनियर क्यों चाहिए थे? कोई दो मजदूर और एक ठेला मिट्टी लाकर भी यही कर सकते थे।
महिलाएं और बुजुर्ग बोले – “यह पुल नहीं, आफत है”
स्थानीय बुजुर्गों का कहना है कि पहले नहर पार करना आसान था, अब यह मिट्टी का दलदल जानलेवा हो चुका है। महिलाएं जिन्हें घर से बाहर निकलना हो, उन्हें इस अस्थायी पुल से निकलने में डर लगता है कि कहीं फिसल कर नहर में ही न गिर जाएं। बच्चों की स्कूली शिक्षा पर भी असर पड़ रहा है क्योंकि कीचड़ भरे इस रास्ते से निकलना जोखिम भरा हो गया है।
जनप्रतिनिधि मौन, प्रशासन खामोश!
इस सारे प्रकरण में हैरान करने वाली बात यह है कि स्थानीय जनप्रतिनिधि इस गंभीर मुद्दे पर मौन हैं। न तो कोई निरीक्षण किया गया, न ही ठेकेदार को कोई नोटिस थमाया गया। नगर पंचायत और तहसील प्रशासन भी जैसे आंखें मूंदे बैठा है। ऐसा लगता है जैसे यह पुल आम जनता के लिए नहीं, बल्कि सरकारी कागजों में ही बना हो।
निवासियों का आवेदन – मांगी जांच और कार्यवाही
वार्डवासियों ने तहसील कार्यालय में एक आवेदन प्रस्तुत किया है, जिसमें उन्होंने मांग की है कि इस अधूरे और अव्यवस्थित पुल निर्माण की जांच कराई जाए, ठेकेदार द्वारा की गई लापरवाही के लिए सख्त कार्यवाही की जाए, और इस कार्य को सीमेंट-कंक्रीट से मजबूत कर पूर्ण किया जाए।
उन्होंने प्रशासन से अपील की है कि इस समस्या को जल्द हल किया जाए ताकि आम नागरिकों को सुरक्षित एवं सुगम मार्ग प्राप्त हो सके।
कटेलपारा की यह पुलिया अब विकास की नहीं, प्रशासनिक लापरवाही और ठेकेदार की लूट की प्रतीक बन गई है। एक ओर सरकार ‘विकास’ की बड़ी-बड़ी बातें करती है, वहीं ज़मीनी हकीकत ऐसी पुलिया पर जाकर धंस जाती है। अब देखना यह है कि प्रशासन इस ‘मिट्टी से बने पुल’ की जांच करता है या इसे भी आने वाली बारिश के भरोसे छोड़ देता है।
“जनता अब यही कह रही है – ठेकेदार का पुल गिरा नहीं, बस जनता की उम्मीदों को कुचल गया!”








