रूडुकेला माध्यमिक विद्यालय में बच्चों से भरवाया जा रहा स्कूल का पानी जिम्मेदार कौन?
लैलूंगा विकासखंड अंतर्गत ग्राम पंचायत रूडुकेला की माध्यमिक विद्यालय से एक चौंकाने वाला मामला सामने आया है। यहां पढ़ने वाले मासूम बच्चों से स्कूल के उपयोग के लिए पानी भरवाया जा रहा है। शिक्षा के मंदिर में बच्चों के हाथों में किताबों की जगह पानी के बर्तन और बाल्टियां थमा दी गई हैं। यह स्थिति न केवल चिंताजनक है बल्कि शिक्षा व्यवस्था पर भी गंभीर सवाल खड़े करती है।
ग्रामीणों के अनुसार विद्यालय में नियमित रूप से बच्चों को हैंडपंप या अन्य स्रोतों से पानी भरकर लाने के लिए कहा जाता है। छोटे-छोटे बच्चे सुबह स्कूल पहुंचते ही पढ़ाई शुरू करने के बजाय पानी की व्यवस्था में लग जाते हैं। कई बार उन्हें कई चक्कर लगाने पड़ते हैं। इससे उनकी पढ़ाई बाधित होती है और थकान के कारण कक्षा में उनका ध्यान भी भटकता है।
जब इस संबंध में विद्यालय की शिक्षिका ईसाबेला (मेडम) से पूछताछ की गई तो उन्होंने अनभिज्ञता जाहिर करते हुए कहा कि उन्हें इस बारे में जानकारी नहीं है कि पानी भरवाने का निर्देश कौन दे रहा है। यह जवाब और भी हैरान करने वाला है। यदि स्कूल में बच्चों से श्रम कराया जा रहा है तो इसकी जिम्मेदारी आखिर किसकी है? क्या प्रधान पाठक को जानकारी नहीं? क्या पंचायत को पता नहीं? या फिर यह सब मिलीभगत से चल रहा है?
शिक्षा विभाग के नियम स्पष्ट कहते हैं कि विद्यालय में बच्चों से किसी प्रकार का श्रम नहीं कराया जा सकता। स्कूल प्रबंधन समिति और ग्राम पंचायत की जिम्मेदारी है कि पेयजल की समुचित व्यवस्था हो। यदि विद्यालय में पानी की स्थायी व्यवस्था नहीं है तो संबंधित विभाग को तुरंत समाधान करना चाहिए। बच्चों से पानी भरवाना न केवल नैतिक रूप से गलत है बल्कि बाल अधिकारों का भी उल्लंघन है।
ग्रामीणों में इस घटना को लेकर आक्रोश देखा जा रहा है। अभिभावकों का कहना है कि वे अपने बच्चों को पढ़ने के लिए स्कूल भेजते हैं, न कि काम करवाने के लिए। यदि जल्द ही इस व्यवस्था में सुधार नहीं किया गया तो वे आंदोलन का रास्ता अपनाने को मजबूर होंगे।
अब बड़ा सवाल यह है कि क्या शिक्षा विभाग इस मामले में संज्ञान लेगा? क्या जिम्मेदारों पर कार्रवाई होगी? या फिर यह मामला भी अन्य मामलों की तरह फाइलों में दबकर रह जाएगा?
ग्राम पंचायत रूडुकेला के माध्यमिक विद्यालय में बच्चों से पानी भरवाने का यह मामला प्रशासन की लापरवाही को उजागर करता है। जरूरत है तत्काल जांच और ठोस कार्रवाई की, ताकि शिक्षा का मंदिर सच में बच्चों के भविष्य को संवारने का स्थान बन सके, न कि श्रम कराने का केंद्र।








