“छोटी घटनाओं पर संज्ञान लेने वाली पुलिस आखिर इतने बड़े कथित नेटवर्क तक क्यों नहीं पहुंच रही?”
रायपुर/भिलाई। छत्तीसगढ़ की राजनीति और प्रशासनिक व्यवस्था में उस समय नई हलचल पैदा हो गई, जब विधायक रिकेश सेन ने अपने फेसबुक पोस्ट के माध्यम से पुलिस महानिदेशक अरुण देव गौतम के नाम एक तीखा खुला पत्र जारी करते हुए भिलाई इस्पात संयंत्र (BSP) से कथित तौर पर वर्षों से हो रही लोहा चोरी के मामले में व्यापक और निष्पक्ष जांच की मांग उठाई।
“पत्रकारों के सवाल पर मुख्यमंत्री भी असहज नजर आए थे!”
कुछ दिन पूर्व भिलाई इस्पात संयंत्र से कथित लोहा चोरी के मुद्दे पर पत्रकारों द्वारा मुख्यमंत्री विष्णु देव साय से सवाल किए जाने का मामला भी चर्चा में रहा। इस विषय पर मुख्यमंत्री की प्रतिक्रिया और बॉडी लैंग्वेज को लेकर राजनीतिक गलियारों में सवाल उठे थे। अब विधायक रिकेश सेन द्वारा DGP को लिखे गए खुले पत्र ने इस मामले को फिर सुर्खियों में ला दिया है।
हालांकि उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार, विधायक रिकेश सेन इस कथित लोहा चोरी मामले को पहले मुख्यमंत्री के समक्ष भी उठा चुके हैं और जांच की मांग कर चुके हैं।
कड़ा सवाल:
जब मुख्यमंत्री से लेकर DGP तक इस मुद्दे की जानकारी होने के बावजूद कथित 40 वर्षों पुराने नेटवर्क के असली सरगनाओं तक जांच नहीं पहुंची, तो आखिर राष्ट्रीय संपत्ति के इस कथित खेल पर पर्दा किसका है और संरक्षण किसका है?
विधायक ने अपने पोस्ट में गंभीर आरोप लगाते हुए दावा किया है कि विगत लगभग 40 वर्षों में भिलाई इस्पात संयंत्र से हजारों करोड़ रुपये मूल्य की राष्ट्रीय संपत्ति का नुकसान हुआ है। उन्होंने इस पूरे मामले की जांच केवल छोटे आरोपियों तक सीमित न रखकर कथित मुख्य नेटवर्क, ट्रांसपोर्टरों, अधिकारियों और संबंधित संस्थानों तक पहुंचाने की मांग की है।
महत्वपूर्ण: विधायक द्वारा लगाए गए आरोपों की स्वतंत्र आधिकारिक पुष्टि समाचार लिखे जाने तक उपलब्ध नहीं है। आरोपों की निष्पक्ष जांच और संबंधित पक्षों का जवाब आवश्यक है।
“100 से अधिक गाड़ियां रातों-रात क्यों काटी गईं?”
विधायक रिकेश सेन ने अपने पोस्ट में सवाल उठाया कि जिन वाहनों का उपयोग कथित तौर पर लोहा परिवहन और चोरी में किया जाता था, उनमें से 100 से अधिक वाहनों को कथित रूप से रातों-रात काट दिया गया।
उन्होंने DGP से मांग की कि इन वाहनों का पूरा रिकॉर्ड आरटीओ से निकाला जाए और वाहन मालिकों से लेकर उनसे जुड़े ट्रांसपोर्ट नेटवर्क तक जांच पहुंचाई जाए।
सवाल यह है कि—
वाहन किसके थे?
वे किसके नाम पर पंजीकृत थे?
उन्हें कब और क्यों काटा गया?
क्या किसी जांच एजेंसी ने उनके रिकॉर्ड सुरक्षित किए?
यदि ये तथ्य किसी संगठित अपराध की जांच से जुड़े हैं, तो वाहन रिकॉर्ड जांच की महत्वपूर्ण कड़ी हो सकते हैं।
BSP अधिकारियों की भूमिका पर भी सवाल
रिकेश सेन ने अपने पोस्ट में आरोप लगाया कि कथित चोरी के दौरान यदि कोई ट्रांसपोर्टर पकड़ा जाता था तो उसके खिलाफ आपराधिक प्रकरण दर्ज करने के बजाय वाहनों को ब्लैकलिस्ट करने जैसी कार्रवाई क्यों की जाती थी?
उन्होंने मांग की कि इस संबंध में तत्कालीन और वर्तमान जिम्मेदार अधिकारियों की भूमिका की भी जांच होनी चाहिए।
यहां सबसे महत्वपूर्ण सवाल है—
यदि किसी व्यक्ति या कंपनी पर चोरी का संदेह था तो क्या केवल प्रशासनिक कार्रवाई पर्याप्त थी, या पुलिस को आपराधिक जांच करनी चाहिए थी?
इस प्रश्न का उत्तर दस्तावेजों और आधिकारिक जांच के बाद ही स्पष्ट हो सकता है।
स्क्रैप टेंडर और माल के वजन की जांच की मांग
विधायक ने BSP से निकलने वाले स्क्रैप और अन्य सामग्री की निगरानी व्यवस्था पर भी सवाल खड़े किए हैं। उन्होंने मांग की कि वर्षों पुराने रिकॉर्ड की जांच कर यह पता लगाया जाए कि—
* कितने स्क्रैप टेंडर जारी हुए?
* किस कंपनी को ठेका मिला?
* प्लांट से कितना माल बाहर गया?
* प्रत्येक खेप का वजन रिकॉर्ड क्या था?
* सुरक्षा एजेंसियों की निगरानी प्रणाली क्या थी?
* कथित अनियमितताओं की शिकायतों पर क्या कार्रवाई हुई?
यह पूरा मामला केवल चोरी का नहीं बल्कि राष्ट्रीय संपत्ति की सुरक्षा व्यवस्था पर भी सवाल खड़ा करता है।
ट्रांसपोर्ट यूनियन की वसूली पर भी गंभीर आरोप
अपने फेसबुक पोस्ट में विधायक ने ट्रांसपोर्ट यूनियन द्वारा कथित रूप से बड़े पैमाने पर धन वसूली किए जाने का आरोप लगाया है। उन्होंने सवाल किया कि यदि इस प्रकार की गतिविधियां खुलेआम हो रही थीं तो पुलिस और प्रशासन ने स्वतः संज्ञान क्यों नहीं लिया?
विधायक ने धन के कथित उपयोग और उसके प्रवाह की जांच की मांग करते हुए कहा है कि एजेंसियों को यह पता लगाना चाहिए कि वसूली से प्राप्त राशि कहां और किस उद्देश्य से खर्च हुई।
ऐसे मामलों में आर्थिक अपराध शाखा, आयकर विभाग, GST विभाग और प्रवर्तन एजेंसियों के स्तर पर वित्तीय रिकॉर्ड की जांच महत्वपूर्ण हो सकती है।
“छोटे आरोपी पकड़े गए, लेकिन असली नेटवर्क तक कौन पहुंचेगा?”
रिकेश सेन ने अपने पत्र का सबसे बड़ा सवाल यही उठाया है कि अब तक पुलिस द्वारा जिन लोगों को पकड़ा गया है या जिनके विरुद्ध जांच चल रही है, क्या वे वास्तव में इस कथित पूरे नेटवर्क के मुख्य सूत्रधार हैं?
उन्होंने कहा कि जांच को केवल निचले स्तर तक सीमित करने के बजाय कथित रूप से वर्षों से सक्रिय पूरे तंत्र की जांच होनी चाहिए।
सवाल सीधे हैं—
चोरी का माल कहां से निकलता था?
कौन परिवहन करता था?
कौन खरीदता था?
कहां भंडारण होता था?
किसके संरक्षण में नेटवर्क चलता था?
और कथित अवैध कमाई आखिर पहुंचती कहां थी?
रसमड़ा स्थित फैक्ट्री तक जांच पहुंचाने की मांग
विधायक ने अपने पोस्ट में रसमड़ा क्षेत्र स्थित एक फैक्ट्री का उल्लेख करते हुए दावा किया है कि वहां कथित रूप से BSP से चोरी किया गया लोहा पहुंचने की चर्चा लंबे समय से होती रही है।
उन्होंने सवाल उठाया कि यदि ऐसी शिकायतें या सूचनाएं सार्वजनिक रूप से उपलब्ध थीं तो संबंधित प्रतिष्ठानों की जांच क्यों नहीं हुई?
हालांकि, किसी फैक्ट्री या उसके मालिक की संलिप्तता जांच और कानूनी प्रक्रिया से ही स्थापित हो सकती है। इस मामले में संबंधित पक्षों का जवाब और पुलिस जांच महत्वपूर्ण होगी।
DGP अरुण देव गौतम से सीधे सवाल
रिकेश सेन ने DGP अरुण देव गौतम की कार्यशैली और व्यक्तिगत छवि की प्रशंसा करते हुए उनसे इस कथित मामले में व्यक्तिगत रूप से संज्ञान लेने की अपील की है।
उन्होंने लिखा कि जनता को उम्मीद है कि पुलिस प्रमुख बिना किसी राजनीतिक या प्रभावशाली दबाव के राष्ट्रीय संपत्ति को नुकसान पहुंचाने वाले कथित नेटवर्क की निष्पक्ष जांच कराएंगे।
पोस्ट का मूल संदेश स्पष्ट है—
“यदि राष्ट्रीय संपत्ति को वर्षों तक नुकसान पहुंचा है तो जांच केवल छोटे लोगों तक सीमित क्यों रहे? असली सरगनाओं तक पुलिस कब पहुंचेगी?”
अब जांच की मांग केवल राजनीतिक बयान नहीं, जवाबदेही का सवाल
भिलाई इस्पात संयंत्र देश की महत्वपूर्ण औद्योगिक संपत्तियों में से एक है। ऐसे में उससे जुड़े चोरी, स्क्रैप, परिवहन और कथित संगठित नेटवर्क के आरोपों को हल्के में नहीं लिया जा सकता।
यदि विधायक द्वारा लगाए गए आरोपों में तथ्य हैं तो यह मामला सामान्य चोरी का नहीं बल्कि वर्षों से राष्ट्रीय संपत्ति को कथित रूप से नुकसान पहुंचाने वाले संगठित आर्थिक अपराध का हो सकता है।
और यदि आरोप तथ्यहीन हैं, तो इसकी भी निष्पक्ष जांच कर स्थिति स्पष्ट होना आवश्यक है।
अब गेंद पुलिस और जांच एजेंसियों के पाले में है।
जनता जानना चाहती है—
क्या पुराने रिकॉर्ड खुलेंगे?
क्या कबाड़ हो चुकी गाड़ियों का इतिहास निकलेगा?
क्या ट्रांसपोर्टरों की जांच होगी?
क्या वित्तीय लेन-देन की पड़ताल होगी?
क्या BSP अधिकारियों और सुरक्षा व्यवस्था की जवाबदेही तय होगी?
और सबसे बड़ा सवाल—क्या जांच वास्तव में कथित “मास्टरमाइंड” तक पहुंचेगी?
विधायक रिकेश सेन के इस फेसबुक पोस्ट ने एक बार फिर भिलाई स्टील प्लांट से कथित लोहा चोरी के पुराने और गंभीर सवाल को सार्वजनिक बहस के केंद्र में ला दिया है। अब इंतजार इस बात का है कि छत्तीसगढ़ पुलिस मुख्यालय इस पर क्या रुख अपनाता है।
जानता का सवाल
“राष्ट्रीय संपत्ति की चोरी का आरोप 40 साल पुराना है, तो जांच भी क्या केवल कागजों तक सीमित रहेगी?”
सच सामने आना चाहिए—चाहे आरोपी कितना भी प्रभावशाली क्यों न हो। लेकिन फैसला आरोपों से नहीं, निष्पक्ष जांच और सबूतों से होना चाहिए।
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