अब एक देश, एक नाम की ओर!

अब एक देश, एक नाम की ओर!
(व्यंग्य : राजेंद्र शर्मा)

शुक्र है कि दिल्ली की दीवारों पर जगह-जगह लगे पोस्टरों ने एलान कर के सारी दुनिया को एक बार फिर याद दिला दिया है कि प्रधानमंत्री मोदी का अपमान, नहीं सहेगा हिंदुस्तान! वर्ना आए दिन किसी-न-किसी बहाने विपक्षी मोदी जी का जैसे अपमान कर देते हैं, उससे बाहर वालों के मन में कहीं-न-कहीं यह डॉउट भी तो पैदा हो सकता है कि हिंदुस्तान, मोदी का अपमान सहने के लिए तैयार भी हो सकता है! आखिर, हिंदुस्तान ने पहले भी कई बार पल्टियां खाई हैं। आज अपमान सहने को तैयार है, तो कल को कुर्सी से उतारने के लिए भी तैयार हो सकता है! सो खामखां में रिस्क क्यों लेना, भक्तों ने पोस्टर लगाकर सारी दुनिया को बता दिया है — मोदी जी का अपमान, नहीं सहेगा हिंदुस्तान!

और हां! चूंकि इस बार मोदी जी का अपमान करने का जुर्म दिल्ली वाले केजरीवाल ने किया है, सो भक्तों ने उसी पोस्टर में हिंदुस्तान की ओर से ‘केजरीवाल भगाओ’ की डिमांड और जोड़ दी है। वोकल फॉर लोकल होना भी तो जरूरी है! बेचारे भक्त पोस्टर भी नहीं लगाते, तो क्या करते! केजरीवाल की जुर्रत देखिए, पब्लिकली कह रहे हैं कि विपक्ष के लिए 2024 का ही मौका है, मिलकर मोदी जी को हटाने का। वर्ना 2024 में मोदी जी तीबारा चुनकर आ गए, तो उसके बाद तो शायद चुनाव भी नहीं हो। मोदी जी राजा बन जाएंगे, राजा! पर हम पूछते हैं कि हमारे मोदी जी आज भी किसी राजा-महाराजा से कम हैं क्या?

क्या यह मोदी जी का और वास्तव में मोदी जी का नाम लेकर, मोदी जी के नये इंडिया का घनघोर टाइप का अपमान नहीं है कि मोदी जी को जान-बूझकर राजा-महाराजा से कमतर दिखाने की कोशिश की जा रही है। कहा जा रहा है कि मोदी जी अब भी, नौ साल बाद भी, राजा-महाराजा होने से दूर हैं। 2024 की परीक्षा पार कर पाएंगे, तब ही कहीं जाकर राजा-महाराजा बन पाएंगे! सच पूछिए तो इशारा तो यह भी है कि 2024 की परीक्षा में पास होकर दिखाने के बाद भी, राजा-महाराजा बन जरूर सकते हैं, लेकिन तब भी बन ही जाएं, यह भी जरूरी नहीं है। पर, इंग्लैंड में बंदा राजा बनकर बैठ गया, उसे तो किसी चुनाव-वुनाव का इम्तहान नहीं देना पड़ा। फिर मोदी जी के लिए ही ऐसे इम्तहान पर इम्तहान क्यों?

चलो अमृतकाल से पहले तो फिर भी ऐसे इम्तहान-विम्तहान की बात समझ में आती थी। पुराने इंडिया की पुरानी चाल ठहरी। पर अब? अमृतकाल में भी? और अब तो हमारे पास इंग्लैंड वाले राजा की तरह सेंगोल उर्फ राजदंड भी है। सिंपल है, जिसके पास राजदंड, वो राजा! एक साल ही सही, पर राजा बनने के लिए मोदी जी अब इंतजार क्यों करेंगे! और उनसे किसी इम्तहान वगैरह में बैठने की उम्मीद करना तो नये इंडिया का सरासर अपमान है। मोदी जी का अपमान, नहीं सहेगा नया हिंदुस्तान।

सच पूछिए तो मोदी जी भी 2024 वगैरह तक इंतजार करने के चक्कर में बिल्कुल नहीं पड़ रहे हैं। सेंगोल उर्फ राजदंड प्राप्त होने के बाद से तो उन्होंने बाकायदा, राजकर्म की प्रैक्टिस भी शुरू कर दी है। देख लीजिए, मणिपुर जल रहा है। करीब सवा महीने से जल रहा है। हर अगले रोज, पिछले वाले दिन से ज्यादा बुरी तरह से जल रहा है। हर कोई कह रहा है कि मणिपुर जल रहा है। पर मजाल है, जो मोदी जी के मुंह से उफ तक निकली हो! बड़े-बड़े साम्राज्यों में छोटी-मोटी आग तो लगती ही रहती हैं, उनसे परेशान होने लगे, तब तो चल चुका राजपाट। पर सिर्फ मुंह से ‘उफ’ निकलने से तो कोई भी रोक ले और कभी भी रोक ले। ‘उफ’ तो मोदी जी ने अपने नये राजमहल के दरवाजे पर, पहलवान बेटियों के पीटे-घसीटे जाने पर भी, अपने मुंह से नहीं निकलने दी। उत्तराखंड से लेकर महाराष्ट्र तक, जगह-जगह नफरत की आग लगाए जाने पर भी। सिर्फ मौन मोदी तो कोई भी हो जाए, बल्कि पहले भी हुए हैं। छप्पन इंच की छाती तो वह कहलाए, जब राज के एक कोने में भयंकर आग लगी हो और बड़ो हुकुम, बाकी सारी दुनिया को योग सिखाने निकल जाए। दुनिया को शांति से लेकर डेमोक्रेसी तक का पाठ पढ़ा आए, सो ऊपर से!

विपक्ष वाले अब भी अगर केजरीवाल वाली ही गलती करना चाहते हैं और इसी गफलत में रहना चाहते हैं कि अमृतकाल में भी मोदी जी, पुराने भारत वाले ही प्रधानमंत्री बने रहेंगे, तो ये विपक्ष वालों की प्राब्लम है। मोदी जी उनकी गफलत को सही साबित करने के लिए तो, राजदंड चलाने में रू-रियायत नहीं करने वाले।

अब बताइए, कर्नाटक में भगवाइयों की चुनाव में जरा सी हार क्या हो गयी, कांग्रेसी सरकार वाले भगवाइयों की सरकार के फैसले ही पलटने लग गए। उनका धर्मांतरण कानून पलट रहे हैं, सो तो पलट ही रहे हैं, स्कूली बच्चों की किताबों में से उनके नये-नये बैठाए सावरकर, हेगडगेवार वगैरह को निकाल रहे हैं और उनके निकाले, सावित्री बाई फुले, आंबेडकर, नेहरू को दोबारा बैठा रहे हैं! दिल्ली दरबार से उसका जवाब तो मिलना ही था। मिला! जवाब भी नहले पर दहले वाला! उधर कर्नाटक में बच्चों की किताबों में नेहरू वापस आए, तो राजधानी में नेहरू मैमोरियल म्यूजियम एंड लाइब्रेरी सोसाइटी में से, नेहरू को बाहर कर दिया गया। पहले मैमोरियल से नेहरू का नाम गायब हुआ, अब पूरे परिसर, सोसाइटी के नाम के बोर्ड से ही नेहरू का नाम गायब! अब देख लेना — नये भारत में नेहरू का नाम गुम जाएगा!

वैसे नेहरू के नाम से कम-से-कम मोदी जी को कोई प्राब्लम नहीं है। चलता रहता नेहरू का भी नाम। सालों से चल ही रहा था। पर जब हर चीज के नाम में प्रधानमंत्री लगा है, तो नेहरू की जगह, प्रधानमंत्री का नाम क्यों नहीं? आखिरकार, अमृतकाल में भी हम एक देश, एक नाम की ओर नहीं बढ़ेंगे, तो और कब बढ़ेंगे। राष्ट्रीय एकता की खातिर, नेहरू जी को भी मुगलों की तरह, इतिहास से बाहर जाना ही होगा।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार और ‘लोकलहर’ के संपादक हैं।)

चंद्रशेखर जायसवाल
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