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आओ खेलें डेमोक्रेसी संग होली!(व्यंग्य : राजेंद्र शर्मा)

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आओ खेलें डेमोक्रेसी संग होली!
(व्यंग्य : राजेंद्र शर्मा)

देखा, देखा, कैसे विरोधी, डेमोक्रेसी के मर्डर का शोर मचा रहे हैं? मर्डर और वह भी डेमोक्रेसी का? वाकई! पर कैसे?

कह रहे हैं कि केजरीवाल की गिरफ्तारी, डेमोक्रेसी का मर्डर है। सिंपल मर्डर भी नहीं, सीएम की गद्दियों का डबल मर्डर। पहले, झारखंड में हेमंत सोरेन की सीएम की गद्दी का मर्डर और अब दिल्ली में केजरीवाल की सीएम की गद्दी का मर्डर। कहते हैं, ये तो सीरियल किलर वाले लक्षण हैं। पता नहीं अगला नंबर किस विपक्षी सीएम का लग जाए!

खैर! किसी का गुनाह-वुनाव साबित होने तक तो मोदी जी कहां इंतजार करेंगे, सीएम लोगों को जेल भेजा जा रहा है, सो जेल की मर्डर से कम-से-कम कुछ तुक तो जुड़ती है। मगर विपक्षियों की मानें, तो कांग्रेस के खाते बंद करा दिए गए, यह भी डेमोक्रेसी का मर्डर है। अरे बाकी छोड़िए, महुआ मोइत्रा के घर पर सीबीआई का छापा पड़ गया, भाई लोग उसमें भी डेमोक्रेसी का मर्डर खोज लाए हैं।

होना तो यह चाहिए था कि लोकपाल की कुंभकर्णी नींद टूटने और उसके जागकर सीबीआई को जांच का आदेश देने की खुशी में कुछ पटाखे-वटाखे फोड़े जाते, पर यहां तो सीधे मर्डर के ही आरोप लगाए जा रहे हैं।

और तो और, सुप्रीम कोर्ट के हलक में हाथ डालकर एसबीआई से बांड की जानकारियां उगलवाने के बाद से तो भाई लोगों ने, चुनावी बांड को भी डेमोक्रेसी का मर्डर बताना शुरू कर दिया है। कमाल की बात तो यह है कि भाई लोग खुद कह रहे हैं कि ‘चंदा दो, धंधा लो’ या ‘चंदा खिलाओ, जान बचाओ’ के ही सबूत मिले हैं। फिर भी सबूत सिर्फ लेन-देन के और इल्जाम मर्डर का; मोदी जी पर मर्डर का इल्जाम लगाना हलुआ समझ रखा है क्या? ऐसे निराधार आरोपों के लिए विपक्ष के खिलाफ चुनाव आयोग की एक कड़ी चेतावनी तो बनती ही है।

विपक्ष वालों को डेमोक्रेसी के मर्डर का शोर मचाने से पहले, कम-से-कम वक्त और मौका तो देखना चाहिए था। और मौका है, होली का। कहां का मर्डर, मोदी जी तो होली खेल रहे हैं। और अब मोदी जी होली खेलेंगे, तो कोई ऐरे-गैरों के साथ तो खेलने से रहे। मोदी जी ने तो कायदा ही बना लिया है — दीवाली, बार्डर पर फौजियों के साथ और होली, राजधानी में डेमोक्रेसी के साथ। और होली तो होली है। डेमोक्रेसी के साथ होली खेली जाएगी, तो रंग तो उसके चेहरे पर भी मला ही जाएगा। बल्कि जितना गोरा चेहरा, उतना ही पक्का रंग। पर विरोधी, देख-समझकर भी इसे समझने से इंकार कर रहे हैं और झुट्ठे ही मर्डर-मर्डर का शोर मचा रहे हैं। इन्हें तुष्टीकरण की जो पड़ी है। तुष्टीकरण के लिए ही तो विरोधी, डेमोक्रेसी के चेहरे पर रंग मलने को, जोर-जबर्दस्ती से लेकर हिंसा तक से जोड़ रहे हैं।

अरे भाई, साहिब जी कालिख पोतते जा रहे हैं, तो अपनी डेमोक्रेसी जी भी तो खुशी-खुशी कालिख पुतवा रही हैं। जब दोनों साइड राजी, तो क्या करेगा काजी!

वर्ना अदालतों से लेकर मीडिया तक, डेमोक्रेसी जी के रखवालों ने, साहिब का हाथ पकड़ नहीं लिया होता, कि क्या करते हो!

खैर! साहिब तो सनातन संस्कृति में रंग मलने से लेकर, कीचड़ में गिराने तक के जो-जो संस्कार हैं, सारे संस्कारों के साथ डेमोक्रेसी से होली खेलेंगे।

बल्कि इसलिए और भी ज्यादा खेलेंगे कि विरोधियों को, सनातन संस्कारों का विरोधी दिखाना है। आखिर, चुनाव दरवाजे पर हैं और सनातन के सहारे ही तो चार सौ पार जाना है!

फागुन में रंगने-रंगाने के इस उत्सव में डेमोक्रेसी जी सक्रिय तरीके से शामिल तो होंगी ही। आखिरकार ये हमारी डेमोक्रेसी जी हैं, शुद्ध भारतीय डेमोक्रेसी जी। अमृतकाल में अब तो पराधीनता के सारे अवशेष भी खत्म किए जा चुके हैं, पश्चिमी डेमोक्रेसी के अवशेष भी। वैसे भी हम डेमोक्रेसी की मम्मी वाले, पश्चिम वालों की डेमोक्रेसी की नकल क्यों करेंगे? सत्तर-पचहत्तर साल नेहरू वगैरह के चक्कर में हुई तो हुई, पर अब पश्चिम वालों की डेमोक्रेसी की नकल हम हर्गिज नहीं करेंगे। पचहत्तर साल, कोई सत्तारूढ़ मुख्यमंत्री जेल में नहीं भेजा गया, तो अब भेजा जाएगा। एक अकेला नहीं, कईयों को साथ लेकर जाएगा। पचहत्तर साल, किसी मान्यता प्राप्त राजनीतिक पार्टी के खातों को जाम नहीं किया गया तो क्या, अब किया जाएगा। पचहत्तर साल आयकर से छूट के बाद, जुर्माने के तौर पर किसी राजनीतिक पार्टी का सैकड़ों करोड़ रुपया जब्त नहीं किया, तो अब जब्त किया जाएगा।

सत्तर साल में चुनाव से पहले विपक्षी पार्टियों को ऐसे बेड़ियों में नहीं जकड़ा गया था, अब जकड़ा जा रहा है। सत्तर साल पहले हमारे यहां मदर ऑफ डेमोक्रेसी भी तो नहीं थी, अब है! ये पश्चिम वालों की डेमोक्रेसी से अलग है, इट इज डिफरेंट। इतनी डिफरेंट है, इतनी डिफरेंट है कि बाहर वालों ने इसे चुनावी तानाशाही कहना शुरू कर दिया है। इसको डेमोक्रेसी साबित करने के लिए, मोदी जी भी आर्डर देकर डेमोक्रेसी का अपना अलग सूचकांक ही बनवा रहे हैं और वह भी ठेके पर, रिलायंस वालों से। अब प्लीज इसमें कोई दलाली खाने-खिलाने का शोर न मचाए। अब तो चुनावी बांड भी बंद हो चुका है।

खेलें सनातनी होली देवर-भौजाई, ये विपक्षी कौम कहां से आयी!

(व्यंग्यकार वरिष्ठ पत्रकार और ‘लोकलहर’ के संपादक हैं।)

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चंद्रशेखर जायसवाल
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