जशपुरनगर–लुड़ेग से चिकनिपानी–बागबहार मेन रोड बनी ‘धूल का दरिया’! जनता बेहाल, जिम्मेदार मालामाल?
जिले के जशपुरनगर से लुड़ेग होते हुए चिकनिपानी और बागबहार जाने वाली मेन रोड इन दिनों बदहाली की जीती-जागती तस्वीर बन चुकी है। सड़क पर गड्ढे ही गड्ढे, उखड़ी डामर, उड़ती धूल और हर दिन जानलेवा हालात—यही है इस महत्वपूर्ण मार्ग की हकीकत।
धूल से ढका सफर, सांस लेना भी मुश्किल
सुबह-शाम इस रास्ते से गुजरने वाले स्कूली बच्चे, मरीज, किसान और रोजाना आना-जाना करने वाले लोग धूल के गुबार में सफर करने को मजबूर हैं। जैसे ही कोई भारी वाहन गुजरता है, पूरे इलाके में धूल का बादल छा जाता है। दुकानदारों का कहना है कि सामान पर रोज मोटी परत जम जाती है, वहीं राहगीरों की आंखों में जलन और सांस की दिक्कत आम बात हो गई है।
मरीज और छात्र सबसे ज्यादा परेशान
इस मार्ग से कई गांवों के लोग अस्पताल और स्कूल तक पहुंचते हैं। गर्भवती महिलाएं, बुजुर्ग और गंभीर मरीज जब एम्बुलेंस में हिचकोले खाते हुए गुजरते हैं तो स्थिति और भी भयावह हो जाती है। ग्रामीणों का आरोप है कि कई बार मरीजों को समय पर इलाज नहीं मिल पाता क्योंकि सड़क की हालत इतनी खराब है कि वाहन की रफ्तार रेंगने लगती है।
विकास के दावे, जमीनी हकीकत शून्य
एक ओर विकास के बड़े-बड़े दावे किए जा रहे हैं, दूसरी ओर यह मुख्य सड़क खुद बदहाली का शिकार है। स्थानीय लोगों का कहना है कि कई बार शिकायतें की गईं, जनप्रतिनिधियों को अवगत कराया गया, लेकिन मरम्मत के नाम पर सिर्फ खानापूर्ति होती है। थोड़ी-बहुत मिट्टी डालकर या गड्ढों में मुरुम भरकर जिम्मेदारी पूरी मान ली जाती है।
आखिर जिम्मेदार कौन?
सवाल उठता है कि इस अहम सड़क की सुध लेने वाला कौन है? क्या संबंधित विभाग किसी बड़ी दुर्घटना का इंतजार कर रहा है? ग्रामीणों में आक्रोश बढ़ता जा रहा है। लोगों ने चेतावनी दी है कि यदि जल्द पक्की मरम्मत और डामरीकरण नहीं हुआ तो वे आंदोलन का रास्ता अपनाएंगे।
जनता की मांग
1. सड़क का तत्काल सर्वे कराकर स्थायी मरम्मत।
2. धूल से राहत के लिए नियमित पानी का छिड़काव।
3. गड्ढों की पैचवर्क नहीं, बल्कि पूर्ण री-कार्पेटिंग।
4. कार्य में पारदर्शिता और गुणवत्ता की निगरानी।
लुड़ेग से बागबहार तक का यह मार्ग केवल सड़क नहीं, हजारों लोगों की जीवनरेखा है। अगर अब भी प्रशासन नहीं जागा, तो जनता का गुस्सा सड़कों पर फूटना तय है।
अब देखना यह है कि जिम्मेदार अधिकारी जागेंगे या फिर धूल के गुबार में ही विकास के दावे उड़ते रहेंगे?








