ब्रेकिंग न्यूज़ : लैलूँगा जनपद में ‘सत्यनारायण की कथा’ से भी पावन है ‘कमीशन’ की महिमा!…

जनसमस्या निवारण शिविर या ‘अधिकारी कल्याण महोत्सव’? पंचायतों की बलि चढ़ाकर सज रही भ्रष्टाचार की झांकी…



लैलूंगा। अगर आप लैलूंगा जनपद पंचायत की सीढ़ियां चढ़ रहे हैं और आपकी जेब में ‘गांधी जी’ (नोट) नहीं हैं, तो यकीन मानिए आप किसी कार्यालय नहीं बल्कि किसी प्राचीन खंडहर में घूम रहे हैं जहाँ पत्थर भी नहीं पसीजते। यहाँ का सिस्टम इतना ‘ईमानदार’ है कि बिना कमीशन के यहाँ की फाइलें योग मुद्रा में चली जाती हैं – यानी पूरी तरह अचल और अडिग!

कमीशन : जनपद का ‘नेशनल एंथम’ -लैलूंगा जनपद में बाबू से लेकर कंप्यूटर ऑपरेटर तक, सब एक सुर में ‘कमीशन-चालीसा’ का पाठ करते हैं। यहाँ काम होने की शर्त ‘नियम’ नहीं, बल्कि ‘नजराना’ है। बाबुओं का स्वाभिमान इतना ऊंचा है कि जब तक जेब भारी न हो, उनकी गर्दन फाइल की तरफ नहीं झुकती। वहीं, कंप्यूटर ऑपरेटरों की उंगलियां कीबोर्ड पर तभी नाचती हैं, जब उनके स्मार्टफोन के वॉलेट में ‘डिजिटल दक्षिणा’ की घंटी बजती है।

शिविर का ‘चंदा’ और पंचायतों का ‘धंधा’ : हाल ही में आयोजित ‘जनसमस्या निवारण शिविर’ वास्तव में एक जादुई आयोजन था। जनता की समस्याएँ हल हुई या नहीं, यह तो शोध का विषय है, लेकिन पंचायतों की समस्याओं (फंड) को अधिकारियों ने सफलतापूर्वक अपनी ओर ‘निवारित’ कर लिया है।

व्यंग्य का तड़का : सुना है कि शिविर लगाने के लिए ग्राम पंचायतों से ऐसी वसूली की गई जैसे किसी बड़े आयोजन के लिए ‘जगराता’ का चंदा लिया जा रहा हो। पंचायतों को बताया गया कि समस्या निवारण के लिए ‘हवन’ होगा, और उस हवन में पंचायतों के बजट की आहुति दी गई।

यहाँ ‘जीरो टॉलरेंस’ का मतलब है- ‘जीरो काम विदाउट पेमेंट’ : जनपद के गलियारों में चर्चा है कि यहाँ के कर्मचारी इतने कार्यकुशल हैं कि वे चाय की चुस्की के साथ ही बता देते हैं कि किस फाइल से कितनी ‘मलाई’ निकलेगी। अगर आप सीधे-साधे ग्रामीण हैं और अपना हक मांगने आए हैं, तो आपको ऐसे देखा जाएगा जैसे आप मंगल ग्रह से आए कोई अजूबे हों।

सबका साथ, सिर्फ अपनों का विकास’ : लैलूंगा जनपद पंचायत ने सिद्ध कर दिया है कि “सेवा ही परमो धर्म:” पुराना मुहावरा है, नया मंत्र है – “कमीशन ही परमो लाभ:”। पंचायतों से लूटी गई राशि और बाबुओं के चेहरों की चमक इस बात का प्रमाण है कि विकास गाँव की गलियों में पहुंचे न पहुंचे, जनपद के बाबू-ऑपरेटरों के घर के सोफे और गाड़ियां जरूर चमक रही हैं।

प्रशासन से एक मासूम सवाल : साहब! अगली बार जब शिविर लगे, तो क्या पंचायतों को ‘लूट की रसीद’ भी दी जाएगी या इसे ‘गुप्त दान’ मानकर फाइल दबा दी जाएगी?

चंद्रशेखर जायसवाल
चंद्रशेखर जायसवाल
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