
0 पोषण वाली योजना कमीशनखोरी से कुपोषित हो गई.

कोरबा/पाली:- महिला एवं बाल विकास पाली परियोजना के अंतर्गत पोड़ी, सिल्ली, लाफा, माखनपुर सपलवा सहित कई सेक्टरों की आंगनबाड़ियों में बीते सप्ताह मंगलवार को रेडी टू ईट पोषण आहार आपूर्ति नही किया गया। जिससे सैकड़ों हितग्राही गर्भवती एवं शिशुवती माताएं, किशोरी बालिकाएं और 0 से 3 वर्ष के बच्चें पोषण आहार से वंचित रह गए। आंगनबाड़ियों में नियमानुसार पोषण आहार आपूर्ति में मनमानी करने का यह सिलसिला पिछले कई महीनों से चला आ रहा था। जहां मामला सामने आने के बाद अनियमितता के खबर प्रसारित होने से गड़बड़ाए रेडी टू ईट संचालनकर्ता प्रगति स्व सहायता समूह द्वारा आनन- फानन में उन सेक्टरों में पोषण आहार पहुँचा दी गई, जहां आपूर्ति नही की गई थी। लेकिन अब जो आरोप सामने आए हैं वो सीधे शासन की मंशा पर ग्रहण लगाने जैसा है। विभागीय सूत्रों के हवाले से प्राप्त जानकारी के अनुसार खबर के बाद अब समूह ने अपनी अघोषित कमाई का नया रास्ता निकाला है। जिसमे कई सेक्टरों के आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं को लालच देकर कम रेडी टू ईट आपूर्ति किया जा है। यानी आंगनबाड़ी में बच्चों व हितग्राहियों के दर्ज संख्या से आधे पोषण आहार वितरण करना तथा बांकी बचे हुए का हर पैकेट के पीछे 10 रुपए कार्यकर्ताओं का तय किया गया है। सूत्रों के मुताबित एक पैकेट (812.50 ग्राम) रेडी टू ईट तैयार करने में 40 से 50 रुपए खर्च आता है। पाली परियोजना के कुल 14 सेक्टरों के अधीन सैकड़ो आंगनबाड़ी में हजारों की दर्ज संख्या है और महिला एवं बाल विकास विभाग से समूह को हर महीने 20 से 22 लाख रुपए रेडी टू ईट का भुगतान हो रहा है। ऐसे में यदि दर्ज संख्या के आधा से भी कम हिस्से को पोषण आहार नही दिया गया तो हर महीने लाखों की अघोषित कमाई का नायाब तरीका निकाला गया है। यह केवल एक समूह की ही कारगुजारी नही, बल्कि इसमें परियोजना अधिकारी से लेकर सेक्टर सुपरवाइजर की मिलीभगत और आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं से सांठगांठ है। क्योंकि परियोजना अधिकारी के बिना सहमति इतना बड़ा खेल संभव नही। वहीं सेक्टर सुपरवाइजर पर आपूर्ति, स्टॉक, वितरण सबकी निगरानी उन्ही के हाथ मे हैं, तो वहीं कार्यकर्ता दर्ज संख्या अपने हिसाब से बढ़ा- घटा सकती हैं। अब इस पूरे खेल में सबसे बड़ा नुकसान उन बच्चों, गर्भवती महिलाओं, शिशुवती माताओं व किशोरी बालिकाओं को हो रहा है, जिनके स्वास्थ्य और पोषण के लिए यह योजना बनी है और शासन भले ही लाखों- करोड़ों खर्च कर रहा है, लेकिन पूरक पोषण आहार से समूह, अधिकारी- कर्मचारी व कार्यकर्ता पुष्ट व पोषित होने लगे हैं। शासन- प्रशासन इस मामले को गंभीरता से लें। यदि यही हाल रहा तो पाली परियोजना की आँगनबाड़ियाँ पोषण केंद्र नही, वरन कमीशन के खेल में कुपोषण केंद्र बनकर रह जाएगी।






