1200 किसानों को ढैंचा बीज सहित विभिन्न कृषि आदानों पर अनुदान सहायता

रायगढ़, 11 अगस्त 2026/ लैलूंगा क्षेत्र की पहचान बन चुके सुगंधित जवाफूल धान की खेती को विस्तार देने के लिए जिला प्रशासन द्वारा किसानों को निरंतर सहयोग प्रदान किया जा रहा है। डीएमएफ मद और विभागीय योजनाओं के माध्यम से किसानों को हरी खाद के लिए ढैंचा बीज, जैविक तरल खाद तैयार करने के ड्रम, पैडी ट्रांसप्लांटर, माइक्रो न्यूट्रिएंट सहित विभिन्न कृषि आदान अनुदान पर उपलब्ध कराए जा रहे हैं। इससे क्षेत्र में जवाफूल की खेती का रकबा बढ़ने के साथ किसानों को बेहतर बाजार और मूल्य की संभावनाएं मिल रही हैं।
जिला प्रशासन द्वारा जवाफूल की खेती के विस्तार के लिए इस वर्ष डीएमएफ मद से लगभग 48 लाख रुपये की सहायता स्वीकृत की गई है। इसके माध्यम से करीब 1200 किसानों को सुगंधित जवाफूल की खेती के लिए हरी खाद के रूप में ढैंचा बीज वितरित किया गया है। इसके साथ ही विभागीय योजनाओं के तहत आवश्यक कृषि आदान भी उपलब्ध कराए जा रहे हैं। इस पहल का उद्देश्य लैलूंगा की पारंपरिक सुगंधित धान किस्म को संरक्षित करते हुए अधिक से अधिक किसानों को इससे जोड़ना और उनकी आय के नए अवसर विकसित करना है। लैलूंगा निवासी मुक्तेश्वर प्रधान बताते हैं कि वे इस वर्ष करीब दो एकड़ में सुगंधित जवाफूल धान की खेती कर रहे हैं। जिला प्रशासन की ओर से उन्हें ढैंचा बीज सहित कृषि आदानों के लिए अनुदान सहायता मिली है। उन्होंने बताया कि इससे जवाफूल की खेती को बढ़ावा देने में काफी मदद मिल रही है।
इसी तरह किसान गणेशराम पटेल इस वर्ष तीन एकड़ में सुगंधित जवाफूल की खेती कर रहे हैं। उन्हें जिला प्रशासन की ओर से हरी खाद के लिए ढैंचा बीज तथा अन्य कृषि सामग्रियों के लिए अनुदान सहायता प्रदान की जा रही है। वे बताते हैं कि प्रशासन के सहयोग से जवाफूल की खेती को बड़े क्षेत्र में करने का अवसर मिला है। किसान निराकार प्रधान बताते हैं कि वे पहले मोटे धान की खेती करते थे, लेकिन अब जिला प्रशासन के सहयोग से जवाफूल की खेती कर रहे हैं। उन्हें आर्थिक सहायता के साथ ढैंचा बीज और अन्य कृषि सामग्री उपलब्ध कराई जा रही है। उन्होंने बताया कि पिछले वर्ष उत्पादित जवाफूल चावल को उन्होंने करीब 150 रुपये प्रति किलोग्राम की दर से विक्रय किया था। बेहतर मूल्य मिलने से इस वर्ष उन्होंने भी जवाफूल की खेती को अपनाया है।
जैविक खेती से किसानों की बचत, मिट्टी और पर्यावरण को भी लाभ
लैलूंगा में जवाफूल की खेती को बढ़ावा देने के साथ जैविक एवं पर्यावरण अनुकूल कृषि पद्धति को भी प्रोत्साहित किया जा रहा है। किसान जवाफूल की खेती में जैविक खाद और हरी खाद का उपयोग कर रहे हैं। इसके लिए किसानों को ढैंचा बीज उपलब्ध कराया गया है, जिससे वे खेत में हरी खाद तैयार कर उसका उपयोग कर सकें। जैविक खाद के उपयोग से रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता कम करने और उनकी खरीद पर होने वाले खर्च में बचत करने में किसानों को मदद मिल रही है। किसानों के अनुसार जैविक खाद के उपयोग से खेती की लागत को नियंत्रित करने के साथ खेत की मिट्टी की गुणवत्ता बनाए रखने में भी मदद मिलती है।
हरी खाद के रूप में ढैंचा का उपयोग मिट्टी में जैविक पदार्थ बढ़ाने और उसकी उर्वरता बनाए रखने में सहायक होता है। इससे खेती की प्रक्रिया अधिक टिकाऊ और पर्यावरण के अनुकूल बनती है।
कृषि विभाग के अधिकारियों ने बताया कि जैविक खाद को प्राथमिकता दिए जाने से रासायनिक खाद के उपयोग में कमी, किसानों के कृषि खर्च में बचत तथा पर्यावरण संरक्षण जैसे कई सकारात्मक परिणाम सामने आ रहे हैं। इस प्रकार लैलूंगा में जवाफूल की खेती केवल किसानों की आय बढ़ाने का माध्यम नहीं बन रही है, बल्कि प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण और टिकाऊ कृषि को बढ़ावा देने की दिशा में भी महत्वपूर्ण पहल साबित हो रही है। जिला प्रशासन द्वारा उपलब्ध कराए जा रहे ढैंचा बीज और अन्य कृषि आदानों से अधिक से अधिक किसानों को इस पद्धति से जोड़ने का प्रयास किया जा रहा है।
जीआई टैग की दिशा में भी आगे बढ़ रही पहल
लैलूंगा का जवाफूल अपनी विशिष्ट सुगंध और गुणवत्ता के कारण क्षेत्र की विशेष पहचान बना रहा है। इसकी मांग रायपुर और अंबिकापुर सहित देश के विभिन्न बाजारों तक पहुंच रही है। जवाफूल को जीआई टैग दिलाने की दिशा में भी पहल आगे बढ़ रही है। नया रायपुर में आयोजित बैठक में लैलूंगा के किसानों ने जीआई टैग से संबंधित टीम के समक्ष जवाफूल की विशेषताओं और इसकी पारंपरिक खेती का प्रस्तुतिकरण किया था। इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय के माध्यम से आवश्यक दस्तावेज भारत सरकार को भेजे जाने की प्रक्रिया की गई है।
बेंगलुरु की टीम द्वारा लैलूंगा पहुंचकर किसानों के खेतों का करेंगे निरीक्षण
जवाफूल की बढ़ती पहचान के बीच बेंगलुरु की टीम द्वारा लैलूंगा पहुंचकर किसानों के खेतों का निरीक्षण तथा सीधे खरीदी की संभावनाओं पर चर्चा किए जाने की तैयारी है। इससे स्थानीय किसानों को बड़े बाजारों से सीधे जुड़ने का अवसर मिलेगा।
डीएमएफ से लगातार मिल रहा सहयोग
लैलूंगा में जवाफूल की खेती को बढ़ावा देने के लिए डीएमएफ के माध्यम से पहले भी किसान समूहों को आर्थिक सहयोग दिया गया है। किसान समूहों को उपलब्ध कराई गई सहायता से जवाफूल की संगठित एवं जैविक खेती को बढ़ावा मिला है। जिला प्रशासन की पहल से लैलूंगा के पारंपरिक सुगंधित जवाफूल को नई पहचान देने के साथ स्थानीय किसानों को बेहतर बाजार, बेहतर मूल्य और आय के नए अवसर उपलब्ध कराने की दिशा में महत्वपूर्ण कार्य हो रहा है। इसके साथ ही जैविक खाद और हरी खाद के उपयोग से रासायनिक खाद पर होने वाले खर्च में बचत, मिट्टी की गुणवत्ता में सुधार और पर्यावरण संरक्षण को भी बढ़ावा मिल रहा है।





