
बम्हनीडीह। उल्लास नवभारत साक्षरता पखवाड़ा अंतर्गत 10 सितंबर 2026 को विकासखंड बम्हनीडीह के विभिन्न विद्यालयों में वाचन दिवस का आयोजन उत्साहपूर्वक किया गया। इस अवसर पर बच्चों ने कहानी वाचन, पठन-पाठन और बुजुर्गों से कहानी सुनने जैसी गतिविधियों में बढ़-चढ़कर भाग लिया।
ग्राम सेमरिया (बम्हनीडीह) में कक्षा आठवीं के छात्र देवप्रकाश की दादी खीकबाई ने अपने नाती को छत्तीसगढ़ी लोककथा “बघवा आऊ कोलिहा” रोचक अंदाज में सुनाई। इसके बाद देवप्रकाश ने अपनी दादी को “मगरमच्छ और बंदर” की कहानी सुनाई। दादी और नाती के बीच कहानी सुनाने-सुनने का यह अनूठा संवाद बच्चों और बुजुर्गों के बीच आत्मीयता के साथ-साथ सहयोगात्मक अधिगम का सुंदर उदाहरण बना।
विकासखंड के विभिन्न विद्यालयों में भी बच्चों ने वाचन दिवस पर उत्साह के साथ पुस्तकों का पठन किया। गतिविधियों के माध्यम से बच्चों में पढ़ने की रुचि, भाषा कौशल और अभिव्यक्ति क्षमता विकसित करने का प्रयास किया गया।

विकासखंड शिक्षा अधिकारी बसंत चतुर्वेदी ने कहा कि दादी-नानी की कहानियां हमारी भारतीय सांस्कृतिक विरासत का अनमोल हिस्सा हैं। ये कहानियां केवल मनोरंजन का साधन नहीं, बल्कि बच्चों के मानसिक, नैतिक और सामाजिक विकास का प्रभावी माध्यम हैं। राजा-रानी, परियों, पंचतंत्र और जातक कथाओं के माध्यम से बच्चे ईमानदारी, दया, साहस और परोपकार जैसे जीवन-मूल्यों को सहजता से सीखते हैं।
बीआरसी एच.के. बेहार ने कहा कि कहानियां सुनते समय बच्चे अपने मन में एक नई दुनिया का निर्माण करते हैं। इससे उनकी रचनात्मकता बढ़ती है और नए शब्दों के प्रयोग से भाषा कौशल भी मजबूत होता है। कहानी सुनने का यह अवसर बच्चों और बुजुर्गों के बीच प्रेम, आत्मीयता और विश्वास के रिश्ते को भी मजबूत करता है।
विकासखंड परियोजना अधिकारी, साक्षर भारत डॉ. उमेश कुमार दुबे ने कहा कि लोककथाओं और पारंपरिक कहानियों के माध्यम से बच्चे अपनी लोक संस्कृति, परंपराओं और मातृभाषा के समृद्ध शब्द-भंडार से जुड़ते हैं। उन्होंने कहा कि आज के डिजिटल युग में बच्चे मोबाइल और टीवी स्क्रीन में अधिक समय बिता रहे हैं, जिससे दादी-नानी से कहानी सुनने की परंपरा धीरे-धीरे कम होती जा रही है। इस सांस्कृतिक विरासत को जीवंत बनाए रखने के लिए बच्चों को किताबों और बुजुर्गों के साथ समय बिताने के लिए प्रेरित करना आवश्यक है।
वाचन दिवस की इन गतिविधियों ने न केवल बच्चों में पढ़ने के प्रति उत्साह जगाया, बल्कि पीढ़ियों के बीच संवाद, सहयोग और हमारी लोक संस्कृति से जुड़ाव का संदेश भी दिया।








