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CG LIVE 24 : तहसील कार्यालय मुकड़ेगा बना उपेक्षा का शिकार, लिपिक की अनुपस्थिति से ग्रामवासी परेशान

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तहसील कार्यालय मुकड़ेगा बना उपेक्षा का शिकार, लिपिक की अनुपस्थिति से ग्रामवासी परेशान

मुकड़ेगा (छत्तीसगढ़): शासन की मंशा के अनुरूप ग्रामीणों को ज़मीन संबंधी कार्यों के लिए दूर-दराज़ के तहसील कार्यालयों के चक्कर न काटने पड़ें, इसी सोच के तहत छत्तीसगढ़ शासन द्वारा तहसील मुकड़ेगा का गठन किया गया था। यह कार्यालय आसपास के गाँवों को राहत देने के उद्देश्य से खोला गया, जिससे ग्रामीणों को उनके भूमि, खसरा, खतौनी, नामांतरण और अन्य राजस्व संबंधी मामलों में आसानी से निपटारा मिल सके। लेकिन हालात यह हैं कि यह तहसील कार्यालय अपनी उपयोगिता सिद्ध करने की बजाय खुद ही समस्याओं का केंद्र बन गया है।

तहसील मुकड़ेगा के लिपिक संदीप शिंदे (ग्रेड-02) की लगातार अनुपस्थिति ने इस सरकारी व्यवस्था की पोल खोल दी है। क्षेत्रवासियों का कहना है कि यह कार्यालय हफ्तों तक बंद रहता है, और जब कभी-कभार खुलता भी है तो दोपहर से पहले ही ताले लटक जाते हैं। जनता का आक्रोश दिन-ब-दिन बढ़ता जा रहा है, क्योंकि शासन द्वारा जो सुविधा उन्हें दी गई थी, वह अब असुविधा का कारण बनती जा रही है।

“काम के लिए आते हैं, और खाली हाथ लौट जाते हैं”

ग्राम मुकड़ेगा, , बेसकीमुड़ा, सोनाजोरी, तोलमा, बिरसिंगा झारमा सहित दर्जनों गाँवों के ग्रामीण इस तहसील कार्यालय से अपनी जमीन से जुड़ी समस्याओं को लेकर आते हैं। लेकिन जब बार-बार कार्यालय बंद मिलता है या कर्मचारी अनुपस्थित रहते हैं, तो उन्हें काफी निराशा होती है।

ग्राम मुकडेगा के किसान और ग्रामीणों ने बताया, “मैं पिछले चार बार से नामांतरण करवाने के लिए तहसील कार्यालय आ रहा हूँ, लेकिन हर बार कार्यालय बंद मिलता है। अब खेती किसानी का समय आ गया है, और हमारे पास ज़मीन का स्पष्ट दस्तावेज नहीं है। ऐसी स्थिति में हम कैसे काम करें?”

इसी तरह तोलमा के एक बुजुर्ग किसान  ने कहा, “सरकार ने तो बहुत अच्छा सोचा था, लेकिन यहां तो कर्मचारी ही नहीं आते। हम गरीब आदमी हैं, बार-बार आना संभव नहीं होता। अगर काम नहीं हो रहा है, तो इसका क्या मतलब कि तहसील खोला गया?”

शासन की मंशा पर प्रश्नचिन्ह

तहसील मुकड़ेगा के लिपिक संदीप शिंदे की गैरहाजिरी को लेकर ग्रामीणों में गहरी नाराजगी है। उनका कहना है कि जब शासन ने यहां सुविधा देने के उद्देश्य से तहसील का गठन किया, तो कर्मचारियों की उपस्थिति और जवाबदेही सुनिश्चित की जानी चाहिए थी। लेकिन ऐसा लगता है कि तहसील की व्यवस्था भगवान भरोसे छोड़ दी गई है।

ग्रामीणों का आरोप है कि लिपिक अपने पद की जिम्मेदारी को गंभीरता से नहीं ले रहे हैं। कार्यालय का ताला अक्सर बंद मिलता है और यदि कभी खुल भी गया, तो कामकाज सिर्फ कुछ घंटों के लिए चलता है। इस प्रकार यह कार्यालय अपने मूल उद्देश्य में असफल होता दिख रहा है।

बड़े आंदोलन की चेतावनी

ग्रामीणों ने चेतावनी दी है कि यदि जल्द ही तहसील कार्यालय की व्यवस्था में सुधार नहीं हुआ, और लिपिक संदीप शिंदे पर कार्यवाही नहीं की गई, तो वे सामूहिक रूप से आंदोलन की राह पकड़ेंगे। ग्राम पंचायत स्तर पर बैठकें शुरू हो चुकी हैं, जिसमें गांव-गांव से लोगों को जोड़ा जा रहा है ताकि एक बड़ा जनआंदोलन खड़ा किया जा सके।

ग्राम मुकडेगा के युवा नेता ने बताया, “हम लोग अब चुप नहीं बैठेंगे। तहसील की यह स्थिति ग्राम वासियों का अपमान है। यदि शासन ने कोई कदम नहीं उठाया, तो हम सभी मिलकर कलेक्टर कार्यालय तक रैली निकालेंगे और जरूरत पड़ी तो अनिश्चितकालीन धरना देंगे।”

प्रशासन की चुप्पी भी सवालों के घेरे में

सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि इस पूरे मामले में स्थानीय प्रशासन की ओर से कोई ठोस प्रतिक्रिया या सुधारात्मक कदम अब तक नहीं उठाया गया है। ग्रामवासियों का कहना है कि उन्होंने कई बार राजस्व निरीक्षक (RI) और एसडीएम कार्यालय को शिकायत की है, लेकिन नतीजा शून्य रहा।

कुछ ग्रामीणों ने यह भी आरोप लगाया कि संबंधित अधिकारियों को इस बात की जानकारी होने के बावजूद भी वे चुपचाप बैठे हैं, जिससे यह संदेह और भी गहरा होता है कि कहीं यह लापरवाही सुनियोजित तो नहीं है।

क्या होगा समाधान?

इस स्थिति में यह स्पष्ट है कि यदि प्रशासन समय रहते कार्रवाई नहीं करता, तो जनता का विश्वास शासन पर से उठ जाएगा। शासन को चाहिए कि ऐसे गैर-जिम्मेदार कर्मचारियों पर सख्त कार्रवाई करे और उनकी जगह ऐसे अधिकारियों की नियुक्ति की जाए जो ग्रामीणों की सेवा भावना से काम करें।

शासन की योजनाएं तभी सफल मानी जाएंगी, जब उनका लाभ अंतिम व्यक्ति तक पहुंचे। यदि तहसील कार्यालय मुकड़ेगा जैसा उदाहरण सामने आता रहेगा, तो यह पूरे राजस्व तंत्र की विश्वसनीयता पर प्रश्नचिन्ह लगाता रहेगा।


निष्कर्षतः, तहसील मुकड़ेगा की स्थिति एक गंभीर चिंता का विषय है। ग्रामवासियों की पीड़ा, सरकारी तंत्र की लापरवाही और कर्मचारियों की उदासीनता मिलकर एक ऐसा माहौल बना रहे हैं, जो लोकतंत्र की जड़ों को कमजोर कर सकता है। अब देखने वाली बात यह होगी कि शासन इस पर कितना गंभीरता से संज्ञान लेता है और कितना जल्द सुधारात्मक कदम उठाता है।

चंद्रशेखर जायसवाल
चंद्रशेखर जायसवाल
OWNER/EDITOR - CHANDRASHEKHAR JAISAWAL Mo.-9340765733
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