नारायणपुर के नितारा कला केंद्र के कलाकारों ने मंच पर जीवंत किया बस्तर का लोकजीवन; पुनर्वासित कलाकारों की सहभागिता ने प्रस्तुति को दिया संवेदनशील और प्रेरक आयाम
चक्रधर समारोह की अंतिम संगीत संध्या में ‘चंदा चकोर’ का मंचन
रायगढ़। अंतर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त 41वें अंतर्राष्ट्रीय चक्रधर समारोह की दसवीं एवं अंतिम संगीत संध्या में नारायणपुर के नितारा कला केंद्र के कलाकारों ने नाटक ‘चंदा चकोर’ की प्रभावशाली प्रस्तुति दी। बस्तर के सुदूर अंचल के जीवन, लोकपरंपराओं, प्रेम और संघर्ष को केंद्र में रखी गई इस प्रस्तुति ने दर्शकों को भावनात्मक रूप से जोड़ा।

बस्तर के गांव, परंपरा और प्रेम की कहानी
‘चंदा चकोर’ की कहानी बस्तर के एक ऐसे गांव की पृष्ठभूमि में है, जहां आधुनिक सुविधाओं का अभाव है, लेकिन प्रकृति, परंपरा और आपसी रिश्तों से जीवन समृद्ध है।
कहानी का मुख्य पात्र चकोर अपनी मां के साथ रहता है और खेती तथा जंगल पर निर्भर होकर जीवन यापन करता है। उसके जीवन में बदलाव तब आता है, जब पड़ोस के गांव के बाजार में उसकी मुलाकात चंदा से होती है।
चंदा एक समृद्ध और पढ़े-लिखे परिवार से है। दोनों के बीच प्रेम पनपता है और यही प्रेम चकोर को अपने अधिकारों के लिए संघर्ष करने की ताकत देता है।
नाटक यह संदेश देता है कि प्रेम इंसान को जीवन बदलने और कठिन परिस्थितियों से संघर्ष करने की शक्ति प्रदान कर सकता है। चंदा और चकोर की कहानी इसी भाव को मंच पर प्रभावी ढंग से प्रस्तुत करती है।
पुनर्वासित कलाकारों की सहभागिता रही खास
नाटक की सबसे खास बात इसमें पुनर्वासित कलाकारों की सहभागिता रही। हिंसा और भटकाव का रास्ता छोड़कर समाज की मुख्यधारा में लौटे इन कलाकारों ने मंच पर अभिनय के माध्यम से अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन किया।
इन कलाकारों की सहभागिता ने ‘चंदा चकोर’ की प्रस्तुति को संवेदनशील और प्रेरक आयाम दिया। दर्शकों ने उनकी कला और मंचीय प्रस्तुति को सराहा।
25 कलाकारों ने मंच पर किया अभिनय
‘चंदा चकोर’ का लेखन एवं निर्देशन हीरा मानिकपुरी ने किया। संगीत गरिमा दिवाकर, सहायक निर्देशन अमन राय तथा मंच सज्जा एवं प्रकाश परिकल्पना अरुण भांगे ने संभाली।
नाटक में कुल 25 कलाकारों ने मंच पर अभिनय किया, जबकि संगीत पक्ष में 5 कलाकार शामिल रहे। प्रस्तुति की अवधि लगभग 1 घंटा 10 मिनट रही।
लोकजीवन से मंच तक पहुंची बस्तर की कहानी
‘चंदा चकोर’ के माध्यम से बस्तर के लोकजीवन, उसकी परंपराओं, रिश्तों, प्रेम और संघर्ष को मंचीय रूप में प्रस्तुत किया गया। चक्रधर समारोह की अंतिम संगीत संध्या में यह प्रस्तुति दर्शकों को बस्तर के सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन से जोड़ने वाली रही।






