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काशी में ‘किरातेश्वर’ शिवलिंग की दिव्य उत्पत्ति — भयमुक्ति और विजय का प्रतीक

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काशी में ‘किरातेश्वर’ शिवलिंग की दिव्य उत्पत्ति — भयमुक्ति और विजय का प्रतीक

प्रस्तुत कर्ता : नरेंद्र मिश्रा (दैनिक अमर स्तंभ)

सनातन धर्मग्रंथों में मोक्षदायिनी और पापभक्षिणी कही गई काशीपुरी केवल तीर्थों की नगरी नहीं, बल्कि स्वयं भगवान शिव की चेतना का विस्तार मानी जाती है। स्कन्दपुराण के काशीखण्ड में वर्णित कथाओं के अनुसार, यहाँ स्थापित प्रत्येक शिवलिंग और देवविग्रह किसी न किसी दिव्य प्रयोजन से प्रकट हुआ है। इन्हीं में एक अत्यंत महत्वपूर्ण और भक्तों को अभय प्रदान करने वाला शिवलिंग है — किरातेश्वर महादेव।

माता पार्वती की जिज्ञासा से प्रकट हुआ माहात्म्य,

देवाधिदेव महादेव जब माता पार्वती को काशी में स्थित असंख्य तीर्थों और शिवलिंगों की महिमा का वर्णन कर रहे थे, तब माता पार्वती ने विशेष रूप से किरात गण द्वारा स्थापित शिवलिंग के विषय में जानने की इच्छा प्रकट की। उन्होंने प्रश्न किया कि अन्य गणों के क्रम में किरात गण काशी कैसे पहुँचे और उनका शिवलिंग किस प्रकार प्रतिष्ठित हुआ।

शिवगणों के काशी न लौटने से उत्पन्न हुआ प्रसंग,

महादेव ने बताया कि काशी की दिव्यता और मर्यादा की स्थापना हेतु उन्होंने अपने अनेक शिवगणों को वहाँ भेजा था। किंतु जब वे गण लौटकर नहीं आए, तो भगवान शिव क्षणिक रूप से चिंतित हो उठे। उसी समय उनके परम भक्त किरात गण ने सेवा-भाव से आगे बढ़कर काशी जाने की अनुमति माँगी।

काशी की भव्यता में मोहित हुए किरात गण,

आज्ञा पाकर किरात गण आकाश मार्ग से काशी पहुँचे। जैसे ही उन्होंने काशी की अलौकिक शोभा, गंगा की पावन धारा और भगवान शिव के पंचायतन वृक्षों को देखा, वे मंत्रमुग्ध हो गए। काशी की शिवमय चेतना ने उनके मन को ऐसा बाँधा कि वे महादेव को दिए गए वचन से विचलित हो गए और कुछ समय तक काशी में ही विचरण करने लगे।

दिवोदास के भवन में आत्मपरीक्षा,

विचरण के क्रम में किरात गण राजा दिवोदास के भवन पहुँचे। तभी उन्हें अपने वचन का स्मरण हुआ। कर्तव्य-बोध से व्याकुल होकर उन्होंने काशी में दोष खोजने का प्रयास किया, ताकि लौटने का कोई कारण मिल सके। वे एक शिकारी की भांति सूक्ष्म दोष ढूंढते रहे, किंतु काशी में उन्हें कोई दोष नहीं मिला। यह अनुभव उनके भीतर भय और पश्चात्ताप उत्पन्न करने लगा।

गंगा स्नान और शिवलिंग की स्थापना,

भगवान शिव के क्रोध की आशंका से भयभीत होकर किरात गण ने गंगा में स्नान किया और तत्पश्चात शिवलिंग की स्थापना कर उसकी आराधना में लीन हो गए। उनकी निष्कपट भक्ति और आत्मसमर्पण से प्रसन्न होकर स्वयं भगवान अविमुक्त (काशी के अधिष्ठाता शिव) उनके ध्यान में प्रकट हुए।

भगवान अविमुक्त का वरदान,

भगवान अविमुक्त ने किरात गण को भयमुक्त करते हुए कहा कि यह समस्त लीला स्वयं भगवान शिव की इच्छा से हो रही है और यह माया माता विशालाक्षी के साथ रची गई है। उन्होंने घोषणा की कि लिंग-स्थापना से किरात गण शिव-दोष से मुक्त हो गए हैं और यह शिवलिंग आगे चलकर ‘किरातेश्वर’ नाम से विख्यात होगा।
उन्होंने यह भी वरदान दिया कि जो भक्त चतुर्दशी तिथि को इस शिवलिंग का अभिषेक करेगा और नाना पुष्पों से अर्चन करेगा, वह धर्म-रक्षा हेतु होने वाले युद्ध या संघर्ष में कभी भयभीत नहीं होगा। उसे सदा विजय प्राप्त होगी और अंततः वह शिवलोक को प्राप्त करेगा।

शास्त्रीय प्रमाण,
स्कन्दपुराण में इस शिवलिंग का वर्णन इस श्लोक से प्राप्त होता है—

किरातेन किरातेशं लिंग काश्यां प्रतिष्ठितम् ।
केदाराद्दक्षिणे भागे भक्तानामभयप्रदम् ॥

अर्थात् किरात गण द्वारा काशी में प्रतिष्ठित यह किरातेश्वर शिवलिंग केदार क्षेत्र के दक्षिण भाग में स्थित है और भक्तों को अभय प्रदान करने वाला है।
आज भी आस्था का केंद्र
धर्माचार्यों के अनुसार, किरातेश्वर महादेव केवल एक शिवलिंग नहीं, बल्कि भय, संशय और आत्मदोष से मुक्ति का प्रतीक हैं। काशी में दर्शन करने वाले श्रद्धालु मानते हैं कि यहाँ की आराधना से साहस, धर्मबोध और शिवकृपा प्राप्त होती है।
काशी की भूमि पर स्थित किरातेश्वर महादेव आज भी यह संदेश देते हैं कि सच्ची भक्ति, पश्चात्ताप और समर्पण से स्वयं भगवान शिव भक्त को अभय और मोक्ष प्रदान करते हैं।

डॉ.यज्ञनारायण तिवारी
श्रीकाशी विश्वनाथ वैदिक ज्योतिष केन्द्र
वाराणसी मो नं 9451895912

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