
लैलूंगा/रायगढ़ तहसीलदार की कुर्सी अब सिर्फ राजस्व तक सीमित नहीं रही, बल्कि यह एक ऐसी “मल्टीटास्किंग मशीन” बन चुकी है, जिस पर शासन-प्रशासन ने जिम्मेदारियों का पहाड़ लाद दिया है। हालात ऐसे हैं कि एक तहसीलदार को रोजाना 60 से ज्यादा अलग-अलग प्रकार के कार्यों को निपटाना पड़ता है—वो भी बिना किसी अतिरिक्त संसाधन के।

संपादक चंद्रशेखर जायसवाल के कलम से ✍️
जनदर्शन से लेकर शिनाख्तगी, राजस्व प्रकरणों से लेकर मंडी जांच, मजिस्ट्रेट ड्यूटी से लेकर लॉ एंड ऑर्डर… यहीं नहीं, जन्म-मृत्यु प्रमाण पत्र, जाति-आय-निवास, EWS, किसान पंजीयन, रकबा सत्यापन, यहां तक कि अवैध रेत खनन और धान परिवहन पर भी नजर रखनी पड़ती है।
स्थिति तब और गंभीर हो जाती है जब तहसीलदार को चुनाव, जनगणना, प्रोटोकॉल, TL मीटिंग, RO बैठक, राजस्व शिविर और ऑनलाइन मीटिंग्स में भी भाग लेना पड़ता है। इसके साथ ही सीमांकन, नामांतरण, बटवारा, गिरदावरी, भू-अर्जन रिपोर्ट, अतिक्रमण हटाना जैसे संवेदनशील मामलों की जिम्मेदारी भी उसी के कंधों पर है।
इतना ही नहीं—मेला ड्यूटी, परीक्षा केंद्र जांच, प्रश्न पत्र पहुंचाना, तेन्दूपत्ता संग्रहण, वृक्ष कटाई, खाद-राशन वितरण सत्यापन, आपदा प्रबंधन, शस्त्र और फटाका लाइसेंस, यहां तक कि न्यायालय में साक्ष्य के रूप में पेश होना भी इसी अधिकारी की ड्यूटी में शामिल है।
सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि
“जो काम कोई विभाग नहीं करता”—वह भी अंततः तहसीलदार के हिस्से में ही डाल दिया जाता है!
जनता पूछ रही है—
क्या एक ही अधिकारी से इतनी उम्मीदें रखना उचित है?
क्या इस बोझ के चलते आम नागरिकों के जरूरी काम समय पर हो पाते हैं?
या फिर यह व्यवस्था खुद अपने ही बोझ तले दबती जा रही है?
जमीनी हकीकत यही कहती है—
तहसीलदार अब अधिकारी कम, “सिस्टम का बोझ ढोने वाला चेहरा” ज्यादा बन चुका है।
अगर समय रहते जिम्मेदारियों का बंटवारा नहीं हुआ, तो ना सिर्फ प्रशासनिक व्यवस्था चरमराएगी, बल्कि जनता को भी इसका खामियाजा भुगतना पड़ेगा।







