लैलूंगा।
जनपद पंचायत में होने वाली एक साधारण सी समीक्षा बैठक अचानक राजनीतिक ड्रामा बन गई… और फिर उतनी ही तेजी से शांत भी हो गई। सवाल अब यह है—क्या यह आक्रोश असली था या सिर्फ दबाव बनाने की रणनीति?
मामला कोड़सिया हाई स्कूल में प्रस्तावित 15 सरपंचों की क्लस्टर बैठक से जुड़ा है। जैसे ही बैठक की भनक लगी, सरपंच संघ ने जनपद कार्यालय के गेट पर मोर्चा खोल दिया। माहौल गरम, नारेबाजी तेज… और प्रशासन पर सीधे सवाल!
लेकिन कहानी में ट्विस्ट तब आया जब जनपद पंचायत की सीईओ खुद मैदान में उतरीं। आक्रोशित सरपंचों को तुरंत सभाकक्ष में बुलाया गया… बंद कमरे में चर्चा हुई… और बाहर आते ही पूरा आंदोलन ठंडा पड़ गया!
15 की बैठक अचानक 75 सरपंचों की कैसे बन गई?
जो आक्रोश सड़कों पर था, वो चंद मिनटों में गायब कैसे हो गया?
यहीं से उठते हैं बड़े सवाल—
जब क्लस्टर आधारित बैठक से विकास को गति देने की बात थी, तो बैठक जनपद कार्यालय में क्यों नहीं हुई?
कोड़सिया हाई स्कूल को ही क्यों चुना गया?
क्या इस बैठक की योजना में सरपंच संघ से कोई पूर्व चर्चा हुई थी?
या फिर कुछ खास चेहरों को साधने और कुछ “जागरूक सरपंचों” से दूरी बनाने की रणनीति थी?
सबसे बड़ा सवाल—
जिस आक्रोश ने जनपद गेट को हिला दिया, वो अचानक शांत क्यों हो गया?
स्थानीय हलकों में अब चर्चा जोरों पर है कि कहीं यह पूरा घटनाक्रम “आक्रोश से अधिक अंदरखाने समझौते” का तो परिणाम नहीं?
जनता पूछ रही है —
क्या सच में समस्या हल हुई, या सिर्फ आवाज दबा दी गई?
फिलहाल प्रशासन और सरपंच संघ दोनों ही चुप हैं…
लेकिन सवाल अब भी गरमा रहे हैं… और जवाब का इंतजार जारी है!








