बाजे-गाजे के साथ निकाली गई करमा डार, बैगा ने सुनाई पारंपरिक कथा; करमा नृत्य और विधि-विधान से विसर्जन के साथ निभाई गई लोक परंपरा
लिबरा, रायगढ़। रायगढ़ जिले के लैलूंगा विकासखंड अंतर्गत ग्राम लिबरा में 18 अक्टूबर को भाई दूज का पर्व पारंपरिक रीति-रिवाजों, धार्मिक आस्था और उत्साह के साथ मनाया गया। इस अवसर पर बहनों ने अपने भाइयों की लंबी उम्र, सुख-समृद्धि और खुशहाली की कामना करते हुए व्रत रखा। गांव में बाजे-गाजे के साथ करमा डार लाई गई और विधि-विधान से पूजा-अर्चना कर वर्षों से चली आ रही लोक परंपराओं का निर्वहन किया गया।
बाजे-गाजे के साथ लाई गई करमा डार
भाई दूज के अवसर पर शाम को गांव की बहनें एकत्रित हुईं और पारंपरिक तरीके से बाजे-गाजे के साथ करमा डार लेकर आईं। इसे गांव की मुख्य बस्ती में स्थापित कर सामूहिक रूप से पूजा-अर्चना की गई। इस दौरान बहनों ने अपने भाइयों के अच्छे स्वास्थ्य, दीर्घायु और परिवार की सुख-शांति के लिए प्रार्थना की।
पूजा के दौरान गांव के बैगा ने भाई दूज की पारंपरिक कथा सुनाई। उपस्थित महिलाओं ने श्रद्धापूर्वक कथा का श्रवण किया और स्थानीय मान्यताओं के अनुसार धार्मिक अनुष्ठान संपन्न किए। पूरे आयोजन में ग्रामीण संस्कृति, पारिवारिक प्रेम और सामाजिक एकजुटता की झलक देखने को मिली।
खीरा, जुतिया, सरई पान और दातुन से निभाई गई रस्म
ग्राम लिबरा में भाई दूज के दौरान स्थानीय परंपरा के अनुसार विशेष रस्में भी निभाई गईं। बहनों ने खीरा में जुतिया बांधकर तथा सरई के पत्ते और दातुन को लपेटकर प्रतीकात्मक रूप से भाई का स्वरूप तैयार किया। इसके बाद विधि-विधान से पूजा-अर्चना कर भाइयों की लंबी उम्र और मंगलमय जीवन की कामना की गई।
ग्रामीण अंचलों में प्रचलित ये परंपराएं स्थानीय लोकविश्वास और सांस्कृतिक विरासत से जुड़ी हुई हैं। सामूहिक रूप से पूजा-अर्चना में भाग लेकर महिलाओं ने पीढ़ियों से चली आ रही परंपराओं को आगे बढ़ाया।
पारंपरिक करमा नृत्य ने बांधा समां
पूजा-अर्चना और कथा श्रवण के बाद शाम को महिलाओं ने पारंपरिक करमा नृत्य प्रस्तुत किया। इससे गांव में उत्सव का माहौल बन गया। धार्मिक अनुष्ठानों के साथ लोकनृत्य की प्रस्तुति ने आयोजन को विशेष बना दिया।
करमा नृत्य ग्रामीण लोक संस्कृति का महत्वपूर्ण हिस्सा है। ऐसे आयोजनों के माध्यम से स्थानीय सांस्कृतिक विरासत को जीवंत रखने और नई पीढ़ी को अपनी परंपराओं से जोड़ने का अवसर मिलता है।
अगले दिन ईष्ट देव की फेरी के बाद करमा डार का विसर्जन
पर्व की परंपरा के अनुसार अगली सुबह बहनों ने पुनः करमा डार की पूजा-अर्चना की। इसके बाद करमा डार को लेकर गांव के ईष्ट देव की फेरी लगाई गई। पारंपरिक रीति-रिवाजों का पालन करते हुए महिलाएं नदी की ओर रवाना हुईं, जहां पूजा-अर्चना के बाद विधि-विधान से करमा डार का विसर्जन किया गया।
विसर्जन के साथ ही भाई दूज से जुड़े पारंपरिक धार्मिक अनुष्ठान का समापन हुआ। इस दौरान महिलाओं ने स्थानीय मान्यताओं के अनुरूप सभी रस्में निभाईं।
भाइयों को पाठ जुतिया पहनाकर खोला व्रत
करमा डार के विसर्जन और पूजा की परंपरा पूरी होने के बाद बहनों ने अपने भाइयों को पाठ जुतिया पहनाई। इसके पश्चात उन्होंने अपना व्रत खोला। इस परंपरा के माध्यम से बहनों ने भाइयों के प्रति अपने स्नेह, समर्पण और मंगलकामना को व्यक्त किया।
लोक संस्कृति और पारिवारिक प्रेम का दिखा संगम
ग्राम लिबरा में भाई दूज का यह आयोजन धार्मिक आस्था के साथ-साथ ग्रामीण लोक संस्कृति और पारिवारिक संबंधों की मजबूती का प्रतीक बना। सामूहिक पूजा, पारंपरिक कथा, करमा नृत्य और करमा डार के विसर्जन के माध्यम से ग्रामीणों ने अपनी सांस्कृतिक विरासत को सहेजने का संदेश दिया।
बदलते समय में भी इस तरह के आयोजन स्थानीय रीति-रिवाजों को संरक्षित रखने और नई पीढ़ी तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। ग्राम लिबरा में बहनों ने पारंपरिक विधि-विधान के साथ भाई दूज का पर्व मनाकर भाई-बहन के अटूट प्रेम और आपसी विश्वास की भावना को जीवंत किया।











