कांकेर। राष्ट्रीय हिन्दी दैनिक अमर स्तम्भ खास खबर के अनुसार समर्पण सेवा कल्याण समिति की अनूठी मुहिम ने मिसाल पेश की है। गोवंश की सेवा के लिए समर्पित इस संस्था ने अपनी सेवा की शुरुआत को 365 दिन पूरे होने पर सड़कों पर घूमने वाले 300 गोवंश के लिए छप्पन भोग का आयोजन किया। टेलीखेड़ा के बछड़ों से गौमाता की पूजा-अर्चना और गौशाला में विचार गोष्ठी आयोजित की गई, जहां 56 प्रकार के पौष्टिक व्यंजन परोसे गए।
रोज 100 से 125 रोटियों से हो रही है गोवंश की सेवा
समिति के सदस्यों ने बताया कि पिछले एक साल से एक भी दिन ऐसा नहीं गया जब गोवंश को भोजन न मिला हो। इस सेवा में सने, चने, चोकर, भूसा और खली-चूनी से युक्त आहार सहित 56 प्रकार के पौष्टिक आहार दिए जा रहे हैं। हर रोज ताजी 100 से 125 रोटियां और गुड़ खिलाने का क्रम शुरू किया गया। दाल, धनिया, मक्का, आहार, चना, सोयाबीन, गुड़, ताजी रोटियां, चोकर, भूसा और खली-चूनी से युक्त यह आहार गायों के स्वास्थ्य के लिए बहुत लाभदायक है।
छप्पन भोग में अलग-अलग व्यंजनों की रही विशेष व्यवस्था
सड़कों पर घूमने वाले 300 गोवंश को परोसे गए छप्पन भोग में अनाज-अनाज, चौकर और रोटियों में गेहूं, ज्वार, बाजरा, सोयाबीन, मक्का को मिलाकर विशेष भोग तैयार किया गया। 4 अक्टूबर 2025 को इस अभियान की तीसरी वर्षगांठ मनाई गई, सरिया, राडी, संगीत, भजन और कीर्तन के साथ मिलकर सेवा की गई। दक्षिण सिर पर एक हाथ से दाना भरा और सुबह गोवंश को परोसा गया।
देश-विदेश के लोग जुड़े हैं सेवा में
व्हाट्सएप ग्रुप और वीडियो के जरिए जब इस सेवा की जानकारी फैली तो कई लोग जुड़ते चले गए। इस मुहिम में देश के 8 प्रमुख राज्यों से लोग जुड़े हैं। इनमें राजस्थान, कर्नाटक, ओडिशा, आंध्र प्रदेश, मध्य प्रदेश, तेलंगाना, महाराष्ट्र और गुजरात शामिल हैं। यहां तक कि अमेरिका भी गौशाला में भारतीय निर्मित रसा से आर्थिक सहयोग कर रहे हैं।
रुमेन इम्पैक्शन से बचती है जान – एक्सपर्ट व्यू
डॉ. धर्मेन्द्र जोशी, पशु चिकित्सक, थलीसर ने बताया कि सड़कों पर घूमने वाले गौवंश अक्सर कचरा खाने से पॉलीथिन खा लेते हैं। इससे रुमेन इम्पैक्शन की बीमारी हो जाती है, यह पॉलीथिन पेट में जाकर फंस जाती है। यह बीमारी गायों के लिए जानलेवा बन सकती है। 30 से 40 किलो का पत्थर जैसा गोबर बना देती है। इसे पॉलीबीनो प्लास्टिक केन में फंसाकर इससे गायों की जान बचाई जा सकती है। समर्पण समिति द्वारा हर रोज ताजा रोटी, गुड़ और चारा-पानी देने से गौवंश की भूख शांत होती है, वे कचरा खाने से बचते हैं। गुड़ पाचन तंत्र में सुधार करता है। यह पहल गौवंश को जहर से बचाने की राह में सस्टेनेबल डेवलपमेंट की दिशा में बेहतरीन मॉडल भी है।






