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शिक्षा का संग्राम : लैलूँगा में बच्चों की छुट्टी नहीं, ट्रैफिक परीक्षा रोज!

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शिक्षा का संग्राम: लैलूंगा में बच्चों की छुट्टी नहीं, ट्रैफिक परीक्षा रोज!”


लैलूंगा /संत माइकल स्कूल, लैलूंगा, के बच्चों के भविष्य को सँवारने की जिम्मेदारी तो निभा रहा है, लेकिन पालकों को रोज ट्रैफिक परीक्षा में बिठा कर उनके धैर्य का टेस्ट जरूर ले रहा है। स्कूल की छुट्टी बजते ही जैसे पूरा लैलूंगा नगर पंचायत ठहर जाता है, वैसे ही पालकों का सब्र भी ठहर जाता है — और फिर शुरू होता है 30 मिनट की देरी वाला “घर वापसी मिशन”।

हर दिन दोपहर में जैसे ही स्कूल की छुट्टी होती है, स्कूल गेट के बाहर पालकों की गाड़ियाँ, ऑटो, बाइक और सायकिलों की ऐसी कतार लग जाती है मानो कोई मेला लगा हो। लेकिन ये मेला नहीं, जाम का मंज़र होता है। और इस मंज़र की वजह है – जुनाडीह की ओर नगर पंचायत द्वारा बना पुल, जो इस समय “जामपुरा फ्लाईओवर” में तब्दील हो चुका है। महज 1 ट्रिप बजरी से ठीक हो सकता है

यह पुल, जो  लोगों की सुविधा के लिए बना है, अब स्कूल की छुट्टी के समय बच्चों और पालकों की असुविधा का प्रतीक बन गया है। पुल की संकरी सड़क पर जब जुनाडीह से स्कूली वाहनों का रेला शुरू होता है, तो लैलूंगा की सड़कें अपने सांस लेने की क्षमता खो बैठती हैं। ऐसे में स्कूली बच्चों को घर पहुंचने में रोजाना 30 मिनट की देरी हो रही है, और पालकों की चिंता एक स्थायी तनाव में बदल चुकी है।

गौरतलब है कि संत माइकल स्कूल परिसर में गाड़ियों की पार्किंग के लिए समुचित व्यवस्था नहीं है। गेट के पास थोड़ी सी जगह में दर्जनों वाहन आकर फँस जाते हैं। स्कूल प्रबंधन गेट के बाहर गाड़ियों की कतार से अनजान बना बैठा है, जैसे कि यह समस्या “शिक्षा के पाठ्यक्रम” में शामिल नहीं है। गाड़ियाँ जहाँ-तहाँ खड़ी रहती हैं, जिससे ट्रैफिक का बहाव और भी अव्यवस्थित हो जाता है।

इतना ही नहीं, नगर पंचायत प्रशासन भी इस समस्या के सामने मूक दर्शक बना बैठा है। ना ट्रैफिक नियंत्रण की कोई व्यवस्था, ना वैकल्पिक मार्ग, और ना ही ट्रैफिक पुलिस की कोई तैनाती। जैसे मान लिया गया हो कि यह “शिक्षा के नाम पर जाम” अब जीवन का हिस्सा है।

स्थानीय पालक ने व्यथित होकर कहा, “बच्चे स्कूल में पढ़ने जाते हैं, लेकिन हम रोज सड़क पर परीक्षा देते हैं। ये रोज की देरी अब हमारी दिनचर्या बन गई है। कोई सुनने वाला नहीं।”

कुछ अभिभावकों ने इस बात पर भी चिंता जताई कि किसी दिन यदि आपातकालीन सेवा जैसे एंबुलेंस या फायर ब्रिगेड को इसी समय स्कूल के सामने से गुजरना पड़े, तो हालात बेकाबू हो सकते हैं।

सवाल यह है कि क्या नगर पंचायत प्रशासन इस समस्या को गंभीरता से लेगा? क्या स्कूल प्रबंधन वाहन पार्किंग के लिए कोई स्थायी समाधान निकालेगा? या फिर पालक इसी तरह जाम में फँसकर बच्चों की छुट्टी को अपनी “टेंशन टाइम” मानते रहेंगे?

फिलहाल तो लैलूंगा में शिक्षा का मतलब सिर्फ ज्ञान नहीं, बल्कि जाम और इंतजार की कला भी बन चुका है।

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चंद्रशेखर जायसवाल
चंद्रशेखर जायसवाल
OWNER/EDITOR - CHANDRASHEKHAR JAISAWAL Mo.-9340765733
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