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कानून के रखवाले पर ही कानून तोड़ने का आरोप!
बलरामपुर में एसडीएम पर मारपीट से मौत का संगीन साया

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कानून के रखवाले पर ही कानून तोड़ने का आरोप!
बलरामपुर में एसडीएम पर मारपीट से मौत का संगीन साया

“जब अनुविभागीय दंडाधिकारी कटघरे में हों, तो आम आदमी न्याय किससे मांगे?

चंद्रिका कुशवाहा/ नरेंद्र मिश्रा
बलरामपुर

बलरामपुर जिले के कुसमी क्षेत्र से उठी एक सनसनीखेज घटना ने पूरे प्रशासनिक ढांचे को कठघरे में खड़ा कर दिया है। आरोप है कि अवैध उत्खनन की जांच के लिए पहुंची राजस्व टीम के साथ मौजूद अनुविभागीय दंडाधिकारी (एसडीएम) पर ग्रामीणों से मारपीट का गंभीर आरोप लगा है, जिसमें एक 62 वर्षीय बुजुर्ग की मौत हो गई। मामला अब सिर्फ एक दुर्घटना या विवाद नहीं, बल्कि कानून और न्याय व्यवस्था की साख से जुड़ा प्रश्न बन चुका है।
घटना हंसपुर गांव की बताई जा रही है। ग्रामीणों के अनुसार देर शाम कुछ लोग खेतों से घर लौट रहे थे, तभी राजस्व विभाग की टीम ने उन्हें रोका। आरोप है कि पूछताछ के दौरान कहासुनी हुई और मामला हाथापाई तक पहुंच गया। इसी दौरान कथित मारपीट में रामनरेश राम नामक बुजुर्ग गंभीर रूप से घायल हो गए। परिजन उन्हें अस्पताल ले जा रहे थे, लेकिन रास्ते में ही उनकी मौत हो गई। दो अन्य ग्रामीण—अजीत उरांव और आकाश अगरिया—भी घायल बताए जा रहे हैं।
जिस अधिकारी का नाम इस पूरे घटनाक्रम में सामने आ रहा है, वे कुसमी के एसडीएम करुण डहरिया बताए जा रहे हैं। हालांकि प्रशासनिक स्तर पर यह स्पष्ट किया गया है कि पूरे मामले की निष्पक्ष जांच की जा रही है और अभी किसी भी निष्कर्ष पर पहुंचना जल्दबाजी होगी।

अवैध खनन या गलतफहमी?

प्रशासनिक सूत्रों का कहना है कि टीम बक्साइट के अवैध उत्खनन की शिकायत पर कार्रवाई करने गई थी। क्षेत्र में लंबे समय से अवैध खनन की शिकायतें मिलती रही हैं। सवाल यह उठ रहा है कि क्या टीम को मौके पर विरोध का सामना करना पड़ा? क्या हालात नियंत्रण से बाहर हो गए? या फिर ग्रामीणों का आरोप सही है कि वे सिर्फ खेत से लौट रहे थे और उन पर अनावश्यक बल प्रयोग किया गया?
यह जांच का विषय है, लेकिन जिस पद पर बैठे अधिकारी पर आरोप लगा है, उसकी संवेदनशीलता मामले को और गंभीर बना देती है। एसडीएम केवल प्रशासनिक अधिकारी नहीं, बल्कि दंडाधिकारी भी होते हैं। उनके पास धारा 107, 144 जैसी शक्तियां होती हैं। वे कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए नियुक्त होते हैं। ऐसे में यदि उन्हीं पर कानून की सीमा लांघने का आरोप लगे, तो यह लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए चिंताजनक संकेत है।

“अगर वही दोषी हों तो न्याय किससे?”

स्थानीय ग्रामीणों में आक्रोश है। गांव में मातम पसरा हुआ है। मृतक के परिजन न्याय की मांग कर रहे हैं। कई सामाजिक संगठनों ने निष्पक्ष जांच और दोषियों पर सख्त कार्रवाई की मांग उठाई है।
यह घटना केवल एक व्यक्ति की मौत नहीं, बल्कि जनता और प्रशासन के बीच भरोसे की परीक्षा बन गई है। आम आदमी के लिए प्रशासन ही अंतिम सहारा होता है। अगर वही व्यवस्था सवालों के घेरे में हो, तो न्याय की उम्मीद किससे की जाए?

जांच का दायरा और कानूनी पहलू,

पुलिस ने मर्ग कायम कर जांच शुरू कर दी है। पोस्टमार्टम रिपोर्ट का इंतजार है, जिससे मौत के वास्तविक कारण स्पष्ट होंगे। घायल ग्रामीणों के बयान भी दर्ज किए जा रहे हैं। वरिष्ठ अधिकारियों ने आश्वासन दिया है कि “कानून से ऊपर कोई नहीं है”—चाहे वह अधिकारी हो या आम नागरिक।
कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि यदि जांच में यह सिद्ध होता है कि आवश्यकता से अधिक बल प्रयोग किया गया या मारपीट की गई, तो संबंधित धाराओं के तहत आपराधिक मामला बन सकता है। साथ ही सेवा आचरण नियमों के उल्लंघन की भी कार्रवाई संभव है।
दूसरी ओर, यदि यह साबित होता है कि टीम पर हमला हुआ था और आत्मरक्षा में बल प्रयोग किया गया, तो तस्वीर अलग हो सकती है। इसलिए हर पक्ष की सुनवाई और साक्ष्यों की निष्पक्ष जांच अनिवार्य है।

प्रशासन के लिए चेतावनी,

बलरामपुर की यह घटना प्रशासन के लिए एक चेतावनी भी है। जमीनी स्तर पर कार्रवाई करते समय संवाद, संवेदनशीलता और संयम अत्यंत आवश्यक है। अवैध खनन जैसे गंभीर मुद्दों पर सख्ती जरूरी है, लेकिन उस सख्ती की सीमा कानून तय करता है, भावनाएं नहीं।

यह मामला प्रदेश की राजनीति और नौकरशाही में भी हलचल पैदा कर सकता है। विपक्षी दलों ने सवाल उठाने शुरू कर दिए हैं, जबकि प्रशासन मामले को तथ्यों के आधार पर देखने की बात कह रहा है।
आगे क्या?

अब निगाहें जांच एजेंसियों पर टिकी हैं। क्या सच्चाई पूरी पारदर्शिता के साथ सामने आएगी? क्या जिम्मेदारी तय होगी? या फिर मामला समय के साथ ठंडा पड़ जाएगा?
एक बुजुर्ग की मौत ने कई परिवारों की नींद छीन ली है। यह घटना याद दिलाती है कि कानून की ताकत केवल दंड देने में नहीं, बल्कि न्याय सुनिश्चित करने में है।

जब अनुविभागीय दंडाधिकारी जैसे पद पर बैठे व्यक्ति पर ही गंभीर आरोप लगें, तो यह केवल एक व्यक्ति का मामला नहीं रहता—यह व्यवस्था की विश्वसनीयता का प्रश्न बन जाता है।

बलरामपुर की यह कहानी अभी अधूरी है। जांच पूरी होने तक सच का हर पहलू सामने आना बाकी है। लेकिन इतना तय है कि यह घटना प्रशासन को आत्ममंथन के लिए मजबूर कर चुकी है।
क्योंकि अंततः सवाल यही है—
कानून के रखवाले भी अगर सवालों के घेरे में हों, तो न्याय की उम्मीद किस दरवाजे पर की जाए?

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