महासमुंद। छत्तीसगढ़ की ऐतिहासिक और पुरातात्विक नगरी सिरपुर ने अंतरराष्ट्रीय पहचान की दिशा में महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल की है। महानदी के तट पर स्थित इस प्राचीन नगर को यूनेस्को (UNESCO) की विश्व धरोहर की अस्थायी सूची में जगह मिली है। इससे सिरपुर की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को वैश्विक स्तर पर पहचान मिलने और पर्यटन विकास की संभावनाएं बढ़ने की उम्मीद है।
सिरपुर अपनी प्राचीन मंदिर स्थापत्य कला, बौद्ध विहारों, दुर्लभ मूर्तियों और ऐतिहासिक अवशेषों के लिए प्रसिद्ध है। इस स्थल की विशेष पहचान यहां शैव, वैष्णव, बौद्ध और जैन परंपराओं से जुड़े पुरातात्विक प्रमाणों का एक साथ मिलना है। यह विविधता सिरपुर को भारतीय इतिहास और संस्कृति की दृष्टि से महत्वपूर्ण बनाती है।
दक्षिण कोसल की राजधानी के रूप में थी पहचान
प्राचीन काल में सिरपुर को श्रीपुर के नाम से जाना जाता था। पांडुवंशी शासकों के समय यह दक्षिण कोसल की राजधानी और राजनीतिक, धार्मिक तथा सांस्कृतिक गतिविधियों का प्रमुख केंद्र रहा। उस दौर में यहां मंदिरों, बौद्ध विहारों और अन्य स्थापत्य संरचनाओं का निर्माण हुआ, जिनके अवशेष आज भी इसके गौरवशाली अतीत की गवाही देते हैं।
सातवीं शताब्दी में चीनी यात्री ह्वेनसांग ने भी इस क्षेत्र की यात्रा की थी। उनके यात्रा विवरणों में इस इलाके में बौद्ध धर्म की उपस्थिति और गतिविधियों का उल्लेख मिलता है। सिरपुर में विभिन्न धार्मिक परंपराओं से जुड़े स्थलों की मौजूदगी तत्कालीन समाज की सांस्कृतिक विविधता को दर्शाती है।
लक्ष्मण मंदिर है स्थापत्य कला की अनमोल धरोहर
सिरपुर का प्रसिद्ध लक्ष्मण मंदिर यहां की स्थापत्य विरासत का प्रमुख उदाहरण है। लगभग 650 ईस्वी में निर्मित यह मंदिर प्राचीन भारतीय ईंट स्थापत्य कला के उत्कृष्ट नमूनों में गिना जाता है। इसका निर्माण पांडुवंशी शासक महाशिवगुप्त बालार्जुन की माता रानी वासटा ने अपने पति हर्षगुप्त की स्मृति में कराया था।
मंदिर की बनावट, नक्काशी और ईंटों से तैयार की गई संरचना प्राचीन भारत की निर्माण कला और शिल्प कौशल को प्रदर्शित करती है। ऐतिहासिक महत्व के कारण यह मंदिर देश-विदेश से आने वाले इतिहास प्रेमियों और पर्यटकों के लिए आकर्षण का केंद्र है।
बौद्ध विहारों से समृद्ध रहा धार्मिक और शैक्षणिक इतिहास
सिरपुर में आनंदप्रभु कुटी विहार, स्वास्तिक विहार और तीवरदेव महाविहार जैसे महत्वपूर्ण बौद्ध स्थल मौजूद हैं। इन संरचनाओं से इस क्षेत्र में बौद्ध धर्म, साधना और अध्ययन की समृद्ध परंपरा का पता चलता है।
इसके अलावा सुरंग टीला, प्राचीन राम मंदिर और महानदी के तट पर स्थित गंधेश्वर महादेव मंदिर भी सिरपुर की पुरातात्विक विरासत के महत्वपूर्ण अंग हैं। यहां मौजूद अलग-अलग धार्मिक स्थलों का समूह इस प्राचीन नगरी के ऐतिहासिक महत्व को और बढ़ाता है।
खुदाई में मिले दो हजार से अधिक पुरावशेष
सिरपुर में हुई पुरातात्विक खुदाई के दौरान दो हजार से अधिक दुर्लभ पुरावशेष मिलने की जानकारी दी गई है। इनमें धातु की मूर्तियां, आभूषण निर्माण से जुड़े उपकरण, लोहे के बर्तन, ताले, दीपक, मिट्टी के घड़े, कांच की चूड़ियां, खिलौने और प्राचीन सिक्के शामिल हैं।
इन वस्तुओं से तत्कालीन समाज के रहन-सहन, शिल्पकला, व्यापार और धार्मिक गतिविधियों को समझने में मदद मिलती है। सिरपुर से प्राप्त भगवान बुद्ध, अवलोकितेश्वर, देवी तारा, तीर्थंकर ऋषभनाथ और भगवान विष्णु से संबंधित धातु प्रतिमाएं भी इस क्षेत्र की धार्मिक और कलात्मक विविधता को सामने लाती हैं।
संरक्षण और पर्यटन विकास को मिल सकती है नई गति
सिरपुर को यूनेस्को की अस्थायी सूची में शामिल किया जाना इसके संरक्षण और पर्यटन विकास के लिहाज से अहम माना जा रहा है। मुख्यमंत्री विष्णु देव साय के नेतृत्व में राज्य सरकार और पर्यटन एवं संस्कृति मंत्री राजेश अग्रवाल के मार्गदर्शन में प्रदेश की ऐतिहासिक धरोहरों को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाने के प्रयास किए जा रहे हैं।
उपलब्ध जानकारी के अनुसार, केंद्रीय संस्कृति एवं पर्यटन मंत्री गजेन्द्र सिंह शेखावत ने 1 जनवरी 2026 को सिरपुर के ऐतिहासिक और पुरातात्विक स्थलों का निरीक्षण किया था। इस दौरान धरोहर के संरक्षण और यूनेस्को की सूची में सिरपुर को स्थान दिलाने के प्रयासों पर जोर दिया गया था।
अस्थायी सूची में जगह मिलना अंतिम दर्जा नहीं
यूनेस्को की विश्व धरोहर की अस्थायी सूची में शामिल होना किसी स्थल को अंतिम विश्व धरोहर दर्जा मिलने के समान नहीं है। यह उस प्रक्रिया का महत्वपूर्ण शुरुआती चरण है, जिसके बाद संबंधित स्थल के नामांकन और मूल्यांकन की प्रक्रिया आगे बढ़ सकती है।
सिरपुर की ऐतिहासिक विरासत, स्थापत्य कला और विभिन्न धर्मों से जुड़े पुरातात्विक प्रमाण इसे विशेष महत्व प्रदान करते हैं। अब इस उपलब्धि से उम्मीद है कि सिरपुर के संरक्षण, शोध, आधारभूत सुविधाओं और पर्यटन गतिविधियों को नई दिशा मिलेगी तथा छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक पहचान को वैश्विक मंच पर और मजबूती मिलेगी।











